अध्यात्म क्या है? अर्थ और परिभाषा

अध्यात्म के विषय में आपने बहुत सी जानकारी प्राप्त की होगी, आपने किसी के माध्यम से सुना होगा, या किताबों पुस्तकों मे पढ़ा होगा, बहुत सी वीडियो देखा होगा, लेकिन मैं जिस अध्यात्म की बात कर रहा हूँ, वह अलग अध्यात्म है, इसलिए आपको समझने दिक्कत हो सकती है, क्योंकि नया बात इतना आसानी से समझ नहीं आता |

adhyaatm kya hai yogendra satnami

अध्यात्म शब्द को जब हम परिभाषित है तो हमे निम्न शब्द प्राप्त होते है |
अध्य + आत्म
अध्य = आधा, 
और
आत्म = स्वयं,
इन दोनों शब्दों को जोड़ने पर, अध्य + आत्म = अध्यात्म होता है |
अध्यात्म का अर्थ :- आधा स्वयं को जानो |

बहुत सारे लोग अध्यात्म को लेकर हउहा बना रखे है, लेकिन सच मानिए तो अध्यात्म में आत्मा का कोई स्थान नहीं है |
तो अध्यात्म के अर्थ से स्पष्ट है, स्वयं को, अपने आप को आधा जानना है |
इस संसार में अगर किसी को जीवन जीना है, हमे स्वयं को जीना है, इसलिए अध्यात्म में आधा स्वयं को जानने पर ज़ोर दिया जाता है |
और आधा इस प्रकृति रूपी संसार को, इस तरह से यह पूर्ण हो जाता है |
कुल मिलकर यह स्पष्ट हो जाता है, हमें स्वयं को जानना है, लेकिन स्वयं के अंतर्गत क्या जानना है |
स्वयं के अंतर्गत जानने के लिए दो विषय आते है |
दिखाई देने योग्य, और जिसे देखा न जा सके |

दिखाई देने योग्य,
शरीर और इंद्रियाँ, 5 ज्ञान इंद्रियाँ और 5 कर्म इंद्रियाँ |

न दिखाई देने वाले,
शरीर के विकार :- काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, दुःख, सुख, मन, बुध्दी, अन्य |

अध्यात्म में इन विषयों को जानने पर ज़ोर इसलिए दिया जाता है, इनको जान लेने से व्यक्ति ज्ञानी होने लगता है, जीवन सफलता की ओर बढ़ने लगता है, दुःख दूर होने लगते है, तर्क का द्वार खुलने लगता है, समझदारी आने लगती है, सही और गलत का एहसास होने लगता है, जीवन का आनंद आने लगता है |
समझने वाली बात तो यह है, अध्यात्म के नाम से पहले स्वयं भ्रमित है और सभी लोगों को भ्रमित करके रखे है, |
अभी भी वक्त है, अध्यात्म को समझे, अर्थात स्वयं को जाने |

योगेन्द्र कुमार सतनामी

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