Thursday, August 8, 2019

कुशाभाऊ पत्रकारिता विवि के विभागाध्यक्ष डॉ. शाहिद अली क्यों छुपा रहे हैं उपस्थिति रजिस्टर?

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कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर की स्थापना स्वर्गीय भारतरत्न अटल बिहारी बाजपेयी ने वैरागी पुरुष कुशाभाऊ ठाकरे के नाम पर 2005 में थी. स्वर्गीय बाजपेयी जी चाहते थे की माधवराव सप्रे जी के सपनों के अनुरूप पत्रकार समाज के मुखर आवाज बने. यह सपना-सपना बन कर ही रह गया. क्योंकि पत्रकारिता विश्वविद्यालय शिक्षण संस्थान की राह पे कभी न चल कर अयोग्य शिक्षकों फर्जी नियुक्ति की राह पर अनवरत अग्रसर है. इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए विश्वविद्यालय में बड़े पैमाने पर एम.फिल. व पी-एचडी की डिग्रीयां UGC की नियमों को ताक में रख कर बाटने का मामला सामने आया है, जिसे सुनिश्चित करने के लिए सूचना का अधिकार 2005 के अधिनियम के तहत विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. के शोधार्थियों राजेश राज, राकेश पाण्डेय,  संजय(शेखर) कुमार की शोध अवधि के समय की उपस्थति पत्रक मांगी गई थी| किंतु विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. शाहिद अली ने सूचना के अधिकार के अंतर्गत मांगे गए सवालों का जवाब देने से यह कहकर इंकार कर दिया की “उपस्थिति रजिस्टर का सम्बन्ध जनहित में नही है” अतः यह जानकारी प्रदान नही की जा सकती. वहीं दूसरी ओर पी-एच.डी. की डिग्री बिना Plagarisem प्रमाण- पत्र की अवार्ड करा दी गई है जो कि पूरी तरह से UGC के मापदंड के विरूद्ध है. भारत सरकार एक ओर जहाँ शिक्षा एवं शोध की गुणवत्ता में सुधार लाने हेतु निरंतर प्रयास कर रही है जिससे विश्व पटल पर भारत के विश्वविद्यालय भी विश्व के अग्रणी 200 विश्वविद्यालयों में स्थान पा सके. वही दूसरी ओर कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय जो कि अपने स्थापना काल से ही शिक्षकों के फर्जी भर्ती को लेकर देश भर में चर्तित रहा है. वहीं अब यह विश्वविद्यालय ugc के नियमों को ताक में रख कर डिग्रीयां देने का भी कार्य कर रहा है. UGC द्वारा जारी मापदंड  2009, 2016 व 2018 के अनुसार एम.फिल. व पी-एचडी. की डिग्री शोध अवधि

(कोर्स्र वर्क) के दौरान नियमित शोधार्थी किसी भी अन्य संस्थान में नियमित रूप नौकरी नही कर सकते जबकि राकेश कुमार (पी-एचडी.-शोधार्थी- जनसंचार अध्ययन विभाग) राजेश कुमार पी-एचडी.-शोधार्थी-जनसंचार अध्ययन विभाग) व संजय कुमार (शेखर) पी-एचडी.-शोधार्थी-जनसंचार अध्ययन विभाग) द्वारा नियमित मीडियाकर्मी के रूप में कार्य किया गया है और जिसे इनके शोध निर्देशक डॉ. शाहिद अली द्वारा छिपाया जा रहा है. ज्ञात है कि डॉ. शाहिद अली वही मीडिया शिक्षक है जिन पर फर्जी अनुभव प्रमाण-पत्र के आधार पर एसोसिएट प्रोफ़ेसर बन जाने पर अदालत द्वारा डॉ. शाहिद अली के प्रमाण पत्रों को फर्जी मानते हुए धोखाधड़ी का प्रकरण पंजीबद्ध धारा 420, 467, 468, 471 और 34 भा.द.स. के तहत दंडनीय अपराध के तहत मामला दर्ज कर गिरफ़्तारी की आदेश दिया गया था और जिससे बचने के लिए डॉ. शाहिद अली ने अदालत से अग्रिम जमानत ले रखी है. यही वजह है कि डॉ. शाहिद अली द्वारा पत्रकारिता क्षेत्र में कार्यरत ऐसे ही पत्रकारों को पीएचडी का हवाला देकर अपनी दाग को छुपाने का सौदा किया जाता रहा है| ताकि वे इन नामचीन पत्रकारों को उनके अनुसार पीएसडी की डिग्री दिलवा दे और यह पत्रकार बदले में डॉक्टर शाहिद अली की छवि को मीडिया में उछलने से बचाए रखे.इनका यह सौदा जरूरतमंद और योग्य विद्यार्थियों के लिए महंगा पड़ता जा रहा ह.  यही वजह है कि अच्छे व जरूरतमंद शिक्षक इस क्षेत्र में अपना कदम नहीं जमा पा रहे हैं. एक और कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय द्वारा मांगी गई सूचना के अधिकार के अंतर्गत संबंधित जानकारी को यह कहकर नकार दिया गया की मांगी गई सूचना जनहित में नहीं आती तो वही दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की सत्ता पक्ष एवं विपक्ष दोनों ने मिलकर कलिंगा विश्वविद्यालय एवं सुन्दरलाल शर्मा दूरस्थ विश्वविद्यालय और बिलासपुर विश्वविद्यालय की पी-एच.डी. पर जाँच बिठा रखी है. यहां प्रश्न यह उठता है कि यही आधार कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय की सभी एम.फिल. एवं पी-एच.डी. की जाँच के लिए उचित क्यों नहीं है? यही हालात रहे तो अब समय दूर नहीं है कि देशभर में दूसरा पत्रकारिता का सबसे बड़ा संस्थान कहा जाने वाला कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय का नाम यूजीसी के फर्जी विश्वविद्यालयों के लिस्ट में शामिल हो जाएगा जिससे आने वाले भविष्य और विद्यार्थियों के साथ पूरी तरह अहित ही होगा. इस स्थिति में कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में की जाने वाली भविष्य की पीएचडी और एमफिल को भी सदैव ही प्रश्नवाचक चिन्ह का सामना योग्य एवं ईमानदार विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को भी करना पड़ेगा|



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