Apr 29, 2019

मानव और पशु में समानताएं : निबंधात्मक तार्किक विवेचन | अमित की कलम से,

ब्रम्हांड में अनेक सौर मंडल और आकाशगंगा का अस्तित्व है, यह विभिन्न अध्ययनों व तर्कों से सिद्ध हो चुका है। हाल के दिनों में बिगबैंग थ्योरी पर भी ढेरों बात हो चुकी है। साथ ही नासा ने पिछले दिनों ब्लैक होल की तस्वीरें जारीकर खलबली मचा दी है। स्टीफन हॉकिंस ने भी भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करने की कोशिश की है। आगे बात करें तो, हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा तारा सूर्य है, जिसकी परिक्रमा लगातार पृथ्वी कर रही है। जिससे दिन-रात होता है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी का निर्माण बहुत बड़े विस्फोट व गैस के संकुचन, ताप व दाब के परिणाम स्वरुप हुआ है।

Similarities-between-human-and-animal
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         ऐसी भी अवधारणा है कि जीवन केवल पृथ्वी ग्रह पर ही संभव है। भले ही वैज्ञानिकों की अनेक टीमों ने चंद्रमा और मंगल ग्रह का चक्कर जरुर लगा लिया है। जीवन की संभावना तथा पानी होने का प्रमाण भी ढूंढ रही है। अब वर्तमान में जितनी जानकारी आज हमारे पास उपलब्ध है, उससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि फिलहाल पृथ्वी पर ही जीवन का अस्तित्व है। अन्य किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की संभावना फिलहाल उकल्पना मात्र है।

पृथ्वी की उत्पत्ति

        अब आते हैं पृथ्वी ग्रह पर, पृथ्वी का जब निर्माण हुआ तो शुरुआती दौर में वह बहुत गर्म था। धीरे-धीरे ठंठा होने के क्रम के साथ गैस, पानी, आक्सीजन जैसी चीजें काफी लंबे कालखंड के बाद धरती पर निर्मित हुई। गैस, धूल के कण तथा जलमंडल का निर्माण हुआ। जिसकी वजह से आगे चलकर जलमंडल में पहली बार जीवों की उत्पत्ति हुई। इसमें अनेक थ्योरी (डार्विन का सिद्धांत), अनेक वैज्ञानिकों द्वारा उपलब्ध है। विभिन्न धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन से अनेक तरह की बातें व तर्क पढ़ने-सुनने को मिलता है।

जीवों की उत्पत्ति

        शुरुआती दौर में, जलचर के रुप में जीवों का निर्माण हुआ फिर उसने धरती पर क्रमिक विकास के साथ अपना पग धरा। समय के साथ उसने आसमान पर भी अपने पंख पसारना प्रारंभ कर दिया। इन सबके पीछे एक कारण था, वातावरण के साथ अनुकूल होना। जीवन अपना रास्ता खोजने लगा। एक कोशिकीय जीव, द्वी कोशिकीय जीव व बहुकोशिकीय जीवों का निर्माण हुआ। जलचर, उभयचर, सरीसृप, स्तनधारी जीवों से धरती सघन होने लगी। इस समय तक सभी जीव प्राकृतिक रुप से जीवन जी रहे थे। कुछ वातावरण में अनुकूल न होने के कारण नष्ट (डायनासोर) भी हो रहे थे। साथ ही कुछ जीव जीवन जीने के क्रम में अपने आपको कठोर बना रहे थे। लगातार अपना रुप बदलकर और प्रकृति के अनुरुप अपने आपको ढालने में कामयाब हो रहे थे। यह लाखों करोड़ों वर्षों का क्रम का प्रतिफल था।

जीवों का विकास क्रम

        इसी क्रम में, इन्हीं सब जीवों से मनुष्य (होमोसेपियन्स) का अस्तित्व भी सामने आया। मनुष्य अन्य जीवों से बहुत कुछ अलग नहीं है। उसका शरीर भी अन्य जीवों की तरह हाड़, मांस, मज्जा, रक्त, कोशिका का संयोजित स्वरुप है। आक्सीजन लेना, कार्बनडाइ  आक्साइड को छोड़ना समान रुप से होता है। पशु और मानव में भोजन, जीवन, प्रजनन, निद्रा सब समान रुप से देखने को मिलता है। कुछ जीवों को उनका मस्तिष्क अन्य जीवों से अलग करता है। साथ ही कौन कितना इस संसार में अपने आपको बेहतर ढंग से विकसित कर पाता है, यह क्रम लगातार चल रहा है। इस कड़ी में मानव अन्य जीवों की तुलना में आगे है।

#मानव और पशु में शारीरिक समानताएं

       मानव और पशु में शारीरिक समानताएं व भोजन- मनुष्य स्तनधारी प्राणी है। अन्य जीवों की तरह वह भी जन्म लेता है। समान रुप से भोजन करता है। लेकिन मानव ने अपना भोजन को परिष्कृत करना सीख लिया है। खेती करना सीख लिया है। नाखून, बाल, दांत इन सब में शारीरिक समानता है। समय के साथ मानव सभ्य होता गया और उसने नाखून को काटकर सौम्यता ग्रहण करने की कोशिश की। सुंदर, सुघड़ रुप धर लिया। ठंड से बचने के लिए शरीर पर मौजूद बाल को उसने काटकर आकर्षक रुप दे दिया। अब उसके दांत कच्चा मांस नहीं खाता, उसने पकाकर स्वादिष्ट व पौष्टिक भोजन करना सीख लिया है। खुले आसमान में नहीं रहता। सियार गुफानुमा बिल में रहता है, मानव ने सर्वसुविधायुक्त पक्के मकान का निर्माण कर लिया है। घोड़ा तेज दौड़ सकता है, मानव ने मोटर कार बना लिया, उड़ने के लिए वायुयान है।

जीवों का गुण

        संचार, कष्ट, दुख, क्रोध, शारीरिक हाव-भाव- मनुष्य ने भाषा और लिपी का निर्माण संचार करने के लिए, अपनी भावनाओं व अनुभूतियों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए कर लिया है। इसी तरह अन्य जीवों ने भी संकेत व आवाजों के माध्यम से किसी आगामी खतरे को भांपकर शोर करना सीख लिया था। शिकार करने के समय एक सदस्य पहरेदारी भी करता है तथा किसी खतरे को भांपकर, सबको आगाह कर देता है। पशुओं में अपना प्रेम दिखाने के लिए अलग तरह का व्यवहार करते पाया गया है। जैसे किसी की आवाज से हम पहचान लेते हैं कि वह कौन सा जीव है। सांप के फुंकारने से, कुत्ते के दुम हिलाने से आप उसके क्रोध या गाय के चाटने से उसके सौम्य व्यवहार का पता लगा सकते हैं। मनुष्य भी इसी तरह का व्यवहार करने लगता है। गुस्सा होने पर जोर से चिल्ला-चिल्लाकर ऊंची आवाज में बात करता है तथा उसकी हृदय की गति तेज हो जाती है। 

भाव व्यक्त करना

        अगर आपने कभी किसी गाय के मृत बछड़े को देखा होगा तो आप अनुभव कर सकते हैं कि गाय की आंखों से आंसू आता है। गाय अपने बछड़े को खोजती है। कौवे के समुदाय में किसी एक साथी के मृत्यु हो जाने पर सभी मिलकर विलाप करते हैं। हाथी के परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर भी वे वहां रुककर अपना दुख प्रकट करते हैं। हाथियों में अपने बच्चे की सुरक्षा बहुत अधिक सतर्कता देखी जाती है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मानवों की तरह ही उनमें भी कई तरह के भाव होते हैं। सिवाय इतना ही कि वे बोल नहीं पाते व हंसकर-रोकर अपनी बात नहीं कह पाते। वरन दुखी अवश्य होते हैं, उनको  भी भय व खुशी का भाव महसूस होता है।

झुण्ड में रहना 

        एक परिवार व समुदाय में रहना- चिंटियों के बहुत बड़े समूह को देखने पर लगता है कि किसी बड़े संगठन का काम चल रहा है। चीटियां बहुत व्यवस्थित व नियमबद्ध तरीके से अपना काम बहुत बेहनत से लगातार करती रहती है, जबतक कि काम पूरा न हो जाए। वैज्ञानिकों का मानना है कि मानवों के समान ही चिटियों, मधुमक्खियों में एक मुखिया अर्थात् रानी (समूह प्रमुख) का राज होता है। जैसे- मनुष्यों ने कबीलों में रहना सीख लिया था। इसी तरह लकड़बग्घों, शेर, जंगली कुत्तों, भेड़िया आदि इन जैसे अनेक पशुओं को समूह में रहते व शिकार करते देखा जा सकता है। इनके समूह में एक मुखिया होता है। अलग-अलग जीवों में कोई नर या मादा, समूह का प्रमुख हो सकता है।

जीवों में जनन

        मानवों की तरह ही अन्य जीव भी अपना बसेरा बनाता है। समय के साथ अपना साथी तलाश कर प्रजनन करता है। बच्चों को दोनों जोड़े मिलकर पालते हैं। बच्चों के बड़े हो जाने पर वे स्वतंत्र होकर विचरण करने लगते हैं। इस तरह अनेक बातें उनमें दिखलाई देता है। 

मानव का स्वाभाविक गुण

       मानवों की विकृत पशुत्व आचरण- जिस तरह पशु मिलकर अपने शिकार पर मिलकर हमला करता है, ठीक उसी तरह वर्तमान समय में मनुष्यों ने दंगा व भीड़हत्या (मॉबलिंचिंग) कर रहे हैं। जिस तरह पशु घात लगाकर शिकार करते हैं, मानवों ने भी घात लगाकर लोगों को लूटने उनकी हत्या करने में इस तरह के पैतरों को इस्तेमाल करने लगा है। मानवों ने बोलना सीख लिया है, लेकिन अपशब्दों व कटु वचनों का भी जमकर प्रयोग करने लगा है। नाखून काटना सीख लिया है, लेकिन बंदूक, तलवार अनेक प्रकार के हिंसक हथियार का निर्माण कर लिया है। मानव दूसरे जीवों से ज्यादा बुद्धिमान जरुर है, लेकिन कुटीलता भी अत्यधिक है। जैसे- किसी भी चुनाव में स्वार्थ की मानव केन्द्रीत राजनीति में केवल मानवों के लिए योजनाएं होता है। अन्य जीवों के लिए इस पृथ्वी पर कोई स्थान नहीं है क्या? क्योंकि पशु वोट नहीं डाल सकता है इसलिए? भले ही पशुओं को देवता तुल्य माना जाता रहा हो, यह महज भावना मात्र या भ्रम मात्र ही है। काल्पनिक छद्म आवरण। असल में केवल मानव ही मानव, अन्य कुछ नहीं।

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मानव एक विकसित प्राणी

        अब मनुष्य स्वयं विचार कर सकता है, कि उसके अंदर कितनी मात्रा में एक मानव होने का गुण व स्वभाव है। कहीं केवल शब्दों का ही, खेल मात्र तो नहीं है! कहीं मानव ने अलग सभ्य नाम अपना जरुर रख लिया हो लेकिन पशुता को अपने भीतर हमेशा पाले रखा हो? आखिर, किस तरह की प्रकृति-प्रवृत्ति उसे पशुओं से अलग कर सकती है? यह विचार करने की आवश्यकता है, कि वे सारे नीति नियम व आचरण क्या है जो मानव को पशु से पृथक करता है? जिसका होना ही मानव का होना है, अन्यथा पशु से कोई बहुत भारी अंतर ‘मानव’ के भीतर नहीं है। 
-Amit K. C. (शोधार्थी)
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