Tuesday, March 5, 2019

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्व विद्यालय बना भ्रस्टा चार का गढ़, छत्तीसगढ़

माननीय
महामहिम राष्ट्रपति / माननीय प्रधानमंत्री / कुलाधिपति महोदया / कुलपति महोदय
कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर की स्थापना मूर्धन्य पत्रकार स्वर्गीय भारतरत्न अटल बिहारी बाजपेयी ने कर्मयोगी कुशाभाऊ ठाकरे के नाम पर 2005 में बड़े सपनों के साथ की थी. बाजपेयी जी चाहते थे की पत्रकार समाज की आवाज बने. पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर, छत्तीसगढ़ शिक्षण संस्थान की राह पे कभी न चल कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राह पर अनवरत अग्रसर है। पिछले लगभग 04 सालों से विश्वविद्याय के कुलपति पद पर डॉ.मानसिंह परमार आसीन हैं। इसके पहले विश्वविद्यालय के चर्चित संघ के कार्यकर्त्ता कुलपति सच्चिदानंद जोशी रह चुके हैं। श्री जोशी ने पत्रकारिता विश्वविद्यालय को जिस तरह से संघ की शाखा के रूप में तब्दील करने की कवायद की वह अपने आप में बेमिशाल हैं। विश्वविद्यालय जहाँ धर्मनिरपेक्ष संस्थान और सरकार से अलग रहकर चलने वाली संस्था होती है, वहीं पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति साहब और तमाम प्रोफेसर बी. जे. पी. के विचारों को आगे लेकर संघ की राह पर चलते रहें हैं। आए दिन संघ से जुड़े हुए कार्यक्रम विश्वविद्याय परिसर में कराए  जाते रहे हैं। जिसमें मुख्यवक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए लोग या पदाधिकारी होते हैं और उस कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के किसी न किसी प्रोफेसर द्वारा किया जाता रहा हैं। विश्वविद्यालय में शिक्षकों की कमी को पूर्ण करने के लिए 2005 में शैक्षणिक पदों के साथ रीडर पद की संविदा नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। इसके लिए पत्रकारिता में स्नातकोत्तर उपाधि, पीएचडी या 8 वर्ष शैक्षणिक अध्यापन या पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्ष का अनुभव जरूरी था। डॉ. शाहिद अली अपनी पत्नी डॉ. गोपा बागची एसोसिएट प्रोफ़ेसर केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर के माध्यम से फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र बनाकर रीडर के पद पर भर्ती हो गया और 2008 में रीडर के पद पर नियमित हो गया। डॉ. अली बड़े ही मंझे खिलाडी है पर क्या करे नक़ल के लिए अक्ल की जरुरत होती है अली कहते है कि वे एम. ए. पत्रकारिता की डिग्री सौराष्ट्र विद्यापीठ से 1997 में पूरी की है और गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर में कोर्स संयोजक और अतिथि प्राध्यापक के पद पर 1995 से ही अध्यापन का अनुभव माना गया यह व्यक्ति एम. ए. पत्रकारिता की डिग्री बाद में पूरी करता है प्राध्यापक पहले बन जाता है। और 01 साल के बीजेएमसी के आधार पर अतिथि प्राध्यापक बन गयाअली यहीं नहीं रुके वे गुजरात विद्यापीठ का रिफ्रेसर कोर्स का प्रमाण पत्र भी 1997 में फर्जी प्रमाण पत्र खुद के द्वारा हस्ताक्षर कर मोदी जी के गुजरात को पलीता लगाने में पीछे नही हटे धन्य है. कुलपति जोशी और मुख्यमंत्री रमन सिंह की पूरी लुटेरी टीम. गजब का शिक्षा के गाल पर तमाचा है. जिसे शैलेन्द्र खंडेलवाल ने आदालत में चुनौती दी. अदालत ने केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर से पूछा की क्या डॉ. अली को जारी किए गए प्रमाण पत्र सही हैं और यह प्रमाणपत्र विश्वविद्यालय प्रशासन ने ही जारी किया है, इस पर गुरु घासीदास विश्वविद्यालय प्रशासन ने लिखित में जानकारी देते हुए कहा कि  डॉ .शाहिद अली ने कभी भी गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर में शिक्षक के पद पर अस्थायी या स्थायी तौर पर कभी भी कार्य नही किया है। अतः डॉ. शाहिद अली की पत्नी और गुरु घासीदास विश्वविद्यालय की जनसंचार विभाग की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ .गोपा बागची द्वारा प्रदान की गयी अनुभव प्रमाण पत्र पूरी तरह से फर्जी है। जिसके आधार पर अदालत ने डॉ. शाहिद अली के प्रमाण पत्रों को फर्जी मानते हुए धोखाधड़ी का प्रकरण पंजीबद्ध धारा 420, 467, 468, 471 और 34 भादस के तहत दंडनीय अपराध के तहत किया, साथ ही शैलेन्द्र खंडेलवाल द्वारा किये गये शिकायतों के आधार पर तत्कालीन सामान्य प्रशासन की सचिव निधि छिब्बर ने अपने जाँच में पाया की डॉ.शाहिद अली के नियुक्ति में प्रक्रिया में UGC के मापदंडों को ताक में रखा गया है और उक्त रीडर की नियुक्ति पूरी तरह से नियमों के विरुद्ध है और डॉ. अली द्वारा उपलब्ध  शैक्षणिक एवं अनुभव प्रमाणपत्र पूरी फर्जी हैं। डॉ. शाहिद अली ने अपने नियुक्ति को जायज ठहराते हुए अपने निर्देशन में पी-एच.डी. की सीटों का विज्ञापन जारी कराकर भूतपूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के खास ओ.एस.डी. विक्रम सिसोदिया की पत्नी श्रीमती कीर्ति सिसोदिया (पीएचडी-शोधार्थी) ने UGC के नियमों को ताक में रखकर बिना किसी उपस्थिति हस्ताक्षर व Plagiarism certificate प्राप्त किए बिना भारत की सबसे बड़ी डिग्री हासिल कर ली।
विज्ञापन एवं जनसंपर्क विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत डॉ. आशुतोष मंडावी एवं प्रबंधन अध्ययन विभाग के सहायक प्रोफ़ेसर डॉ.अभिषेक दुबे तो कुशाभाऊ ठाकरे के शोधार्थियों से दो कदम आगे निकल गए। डॉ. आशुतोष मंडावी ने अपनी पी-एच.डी. लगभग एक दशक में केन्द्रीय विश्वविद्याल बिलासपुर से फर्जी प्रमाण पत्र बाटने के जुर्म में निलंबित डॉ. गोपा बागची के निर्देशन में पत्रकारिता विश्वविद्यालय में नियमित अध्यापन कार्य करते हुए बिना किसी शोध अवकाश व शोध प्रबंधन को बिना plagiarism सर्टिफिकेट के अपने राजनीतिक पहुँच बीजेपी शासनकाल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदेश अध्यक्ष के पद पर लगातार 04 वर्षों तक व वर्तमान में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के पद पर कार्यरत होने एवं संघ के प्रान्त प्रचारक दीपक विश्पुते के सिफारिश से कारण केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर एवं UGC को गुमराह कर पी-एच.डी. की डिग्री हासिल कर लिया। सहायक प्रोफ़ेसर  आशुतोष मंडावी को कुलपति जोशी ने संविदा प्राध्यापक के रूप में नियुक्त किया था और 2008 में जोड़तोड़ से नियमित हो गये आशुतोष मंडावी अपने ज्ञान के लिए मशहूर हैं जिन्हें न लेखन आता है, न पढाना, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे प्रबुद्ध संगठन ने किस आधार पर इनका चयन किया यह सोच का विषय है जो व्यक्ति अपने विषय पर रत्तीभर ज्ञान नहीं रखता वह किसी विचारधारा को कैसे आगे बढ़ा पायेगा।  जहाँ इस व्यक्ति की चोरी पकड़ी जाती है तो अपने राजनितिक पहुँच और वर्तमान में अध्यक्ष होने का भय दुसरे विचारधारा के छात्रों को दिखाने लगता है। छात्रों के बीच कामचोर और बुद्धिहीन गुरु के नाम से लोकप्रिय हैं। इतना ही नहीं, अधिक गुणी व्यक्तित्व के होने के कारण आशुतोष मंडावी को कुलपति जोशी ने Hostel Warden, Sports Officer भी बना दिया था। जिससे वे विश्वविद्यालय को संघ और बीजेपी के आत्मपरिसर बना सकें। आशुतोष मंडावी  विश्वविद्यालय के भव्य समवेत में हर सप्ताह एबीवीपी की कार्यकारिणी मीटिंग भी करते हुए मिल जाते थे। क्या विश्वविद्यालय के कुलपति आफिस, प्रशासनिक भवन और प्रोफेसर्स के केबिन में जितना अधिकार विश्वविद्यालय के कर्मचारियों और अधिकारियों का है उतना ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भी है? अगर नहीं तो फिर आज तक लगातार हो रहे असंवैधानिक तरीके से मीटिंग और शिक्षकों की भागीदारी पर कुलपति ने कोई क़ानूनी कार्यवाई क्यों नहीं की? क्या इसका मतलब यह नहीं मान लेना चाहिए कि मिली-जुली सरकार चलती रही है? इतना ही नहीं आशुतोष मंडावी ने विधानसभा चुनाव के आचार संहिता का जमकर धज्जियाँ उड़ाया उनके निर्देशन में प्रदेश भर के स्कुल और कालेजों में नारी आत्मरक्षा के नाम पर कराटे और आत्म रक्षा के गुर सिखाने का कार्यक्रम चुनाव के समय चलाया गया जिसमे बीजेपी और संघ के अजेंडे का खुलेआम प्रचार किया जाता रहा प्रशासन में सीधे दखल होने के कारण किसी भी संस्थान और संवैधानिक संस्थाओं ने इस तरह के कार्यक्रम में रोक लगाने का हिम्मत नहीं दिखायी। इसकी सत्यता की पुष्टि विभिन्न समाचारों में विधानसभा चुनाव के समय नारी आत्म रक्षा के लिए हुए प्रशिक्षण के कार्यक्रमों से सम्बंधित ख़बरों को देख सकते है।
    पत्रकारिता यूनिवर्सिटी में दो छात्र संगठन हैं जिसमें विवाद NSUI के छात्रों को लेकर खड़ा हुआ था है। NSUI के पदाधिकारी यूनिवर्सिटी में खुलेआम आयोजित  आर. एस. एस. के कार्यक्रम जिसमें राहुल गाँधी मुर्दाबाद, सोनिया गाँधी मुर्दाबाद, मनमोहन सिंह मुर्दाबाद, कांग्रेस पार्टी मुर्दाबाद के नारे लगाये जा रहे थे का विरोध करने कुलसचिव के पास गये और आशुतोष मंडावी ने पुलिस प्रशासन को अपने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का अध्यक्ष होने का धौस देते हुए NSUI समर्थित छात्रों को विश्वविद्यालय में तोड़फोड़ के आरोप में जेल पंहुचा दिया क्योंकि ये छात्र श्री मंडावी के नियुक्ति और संघ समर्थित कार्यक्रमों को हमेशा चुनौती देते रहें थे। जग जाहिर है कि आशुतोष मंडावी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसी संस्था के लिए काबिल नहीं है वे अपनी नियुक्ति को बचाने के लिए संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ओट में छुपकर अपनी राजनीती करते रहे हैं, वर्तमान में बीजेपी की सरकार बदलने के बाद अपने आप को कांग्रेसी बताने लगे है? यह संघ के लिए भी विचारणीय है।
डॉ अभिषेक दुबे ने भी देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से नियमित शोधार्थी के रूप में बिना शोध अवकाश व शोध प्रबंधन को बिना Plagiarism सर्टिफिकेट के जमा कर अपने राजनीतिक पहुँच (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के रायपुर नगर के महामंत्रीं के पद पर कार्यरत व वर्तमान में प्रशासनिक अकादमी निमोरा रायपुर में प्रतिनियुक्ति में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के अनुशंसा के आधार पर कार्यरत है) का इस्तेमाल कर पी-एच.डी. की फर्जी  डिग्री लेली। अभिषेक दुबे मात्र एम. बी.ए. की डिग्री की पात्रता रखते है बिना net phd के सहायक प्रोफ़ेसर के पद पर अपने पिता श्री पद्मश्री सुरेन्द्र दुबे के राजनितिक प्रभाव के कारण नियुक्त हो गये। अयोग्य होंते हुए भी आज प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे को प्रशिक्षण प्रदान कर रहे है। डॉ. दुबे जुगाड़ के लिए जाने जाते है एम.बी.ए. की डिग्री के आधार पर विश्वविद्यालय के मीडिया प्रबंधन विभाग में नौकरी पा लिया जबकि शैक्षणिक योग्यता मीडिया प्रबंधन का माँगा गया था नाकि एम. बी.ए.मार्केटिंग का अपने नौकरी में उठ रहे सवालों और 2018 में सरकार बदलने के डर से पिता श्री सुरेन्द्र दुबे और भाई जोकि संसद सदस्य राजनंदगांव के ओएसडी के राजराजनीतिक रसूख से अतिथि प्राध्यापकों के हवाले कर प्रबंधन विभाग को सत्र के मध्य में छोड़कर प्रशाशनिक अकादमी निमोरा में प्रशिक्षक के पद पर प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ हो गया क्या ये सही शिक्षक है अगर देश में शिक्षक की परिभाषा मार्गदर्शक की है तो माफ़ कीजिए ये देश के सही मायने में गद्दार है।
UGC के मानक के तहत पी-एच.डी. किसी संस्थान में कार्यरत व्यक्ति अगर वह स्वयं के कार्यरत संस्थान से बाहर पीएचडी कर रहा है तो वह बिना अवकाश के नहीं कर सकता, परन्तु डॉ. शाहिद अली ने अपने फर्जी नियुक्ति के तर्ज पर ही विश्वविद्यालय में पी-एच.डी. की डिग्री की दुकान खोल दी है और डॉ. शाहिद अली ने अपनी नौकरी बचने के लिए मुख्यमंत्री के करीबी के पत्नी को मुफ्त में डिग्री बाँट दी, डॉ. शाहिद अली ने अनुसूचित जाति के पी-एच.डी.  शोधार्थी कमल ज्योति जाहिरे की पी-एच.डी. सिर्फ जाति के आधार पर ख़ारिज कर दिया क्योकिं कमलज्योति डॉ.अली के योग्यता पर लगातार सवाल उठाते रहे थे। विश्वविद्यालय में जो छात्र व शोधार्थी ने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई उन्हें बहार का रास्ता दिखा दिया गया या उसे फर्जी तरीके से विश्वविद्यालय में मारपीट और तोड़फोड़ के इल्जाम में पुलिस केस में फसा दिया गया इसका शिकार कमल ज्योति जाहिरे हुआ।
माननीय कुलपति महोदय आप अपने भाषणों में मीडिया और शिक्षा में सुचिता और सत्य की बात करते रहे हैं आप के आँखों के सामने विश्वविद्यालय में अयोग्य रूप से नियुक्त व्यक्तियों के द्वारा शैक्षणिक कार्य को छोड़कर संघ के प्रचार-प्रसार का कार्य करना और कर्मचारियों द्वारा पास फेल का खेल खेला जाना। आप धृतराष्ट्र की भूमिका में रहे है। आप प्रोफ़ेसर के पद से कुछ महीने में सेवानृवित हो जायेंगे, क्या अपनी अंतरात्मा की आवाज पर विश्वविद्यालय में हुए तमाम अयोग्य शिक्षकों की नियुक्तियों को जाँच कराने का कार्य करेंगे। कुलपति महोदय विश्वविद्यालय में अयोग्य प्राध्यापकों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है और आप इनके संरक्षक की भूमिका में पायें गये है। एक बार सच के साथ खड़ा होइए सारा देश आप को दुआएं देगा। योद्धा बनिए, आप नरेन्द्र मोदी जी को अपना आदर्श मानते है, एक ओर मोदी जी भ्रष्ट्राचार से लड़ रहे है। आप नैतिक भ्रष्ट्राचारियों को कब विश्वविद्यालय के पावन धरा से कब बाहर करेंगे।
साथ ही UGC-नईदिल्ली, विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और उच्च शिक्षामंत्री को पत्रकारिता विश्वविद्यालय में हुए अवैध नियुक्तियों एवं पी-एच.डी. डिग्री के गोरखधंधे पर जाँच कराकर दोषीयों को नौकरी से तुरंत बर्खास्त कर जेल भेजना जाना चाहिए, जिससे विश्वविद्यालय में शिक्षा और शोध में गुणवत्ता बढाई जा सके।
धन्यवाद
                                                                         प्रार्थी                                                                                                                                                    छात्र
                                                                     अंकित तिवारी
                                                              कुशाभाऊ ठाकरे
पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर
रायपुर -492013 (छत्तीसगढ़)


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