Jan 24, 2019

समाज की उन्नति में बाधक तत्व - लेख योगेन्द्र कुमार

समाज की उन्नति में बाधक तत्व

samaj ki unnati me badhak tatv www.inhindiindia.in

समाज की सेवा में लगे लोग आईने की तरह होते है, जो भी लोग समाज को देखना चाहते है, ओ समाज के आईने को. अर्थात समाज सेवक को देखते है |
आइना जितना साफ होगा, समाज उतना ही साफ नजर आएगा |
और आइना जितना गन्दा होगा, उतना ही समाज धुंधला नज़र आएगा |
ये आइना जितना साफ हो उतना ही अच्छा है,
आज अनेक स्तर पर अनेक प्रकार के सामाजिक पदाधिकारी आईने है, अगर आइना समजदार है तो स्वंम अपने आप को बदल सकता है, साफ कर सकता है,
लेकिन वही समजदार नहीं है, तो लोगो को उस आईने को साफ करना चाहिये |
कहने का अर्थ आइना को बदलने से नहीं है, लेकिन उस वक्त बदला जा सकता है, जब आइना घिस चूका हो, साफ ही न हो रहा हो |
आज समाज को एक ऐसे आईने की जरुरत है, जो दुसरे आईने के साफ होने का इंतजार न करें, बल्कि स्वंम कुछ करने का दम भरे, |
स्वंम को बदलने पर जोर देवे |
कितनी अजीब बात है,
कहते है, हम पत्थर को पूजने वाले नहीं है,
लेकिन जब विवाह होता है, तो मति मारी जाती है, देव पूजन, पत्थर को पूजने गाँव गली में में जाते है,
कहते है,
मांस मंदिरा वर्जित है,
जब विवाह, जन्म हो तो इसी को प्राथमिकता दी जाती है,
कहते है, मै हिन्दू नहीं हूँ, और जब विवाह का समय आता है,
तो हिन्दू की नियम से विवाह करते है,
आज समाज में इतने गंदे आईने है, जो यह निर्णय नहीं कर पा रहे की,
किसी के मरने पर मुंडन करना सही है या गलत,
ऐसे आईने समाज के घातक है, जो यह निर्णय नहीं कर पा रहे की, मृत्युभोज में मिठाई सही या गलत,
कौन बनाएगा नियम,
कौन उस नियम को मानेगा,
ऐ समाज के आइनों अपने आप को साफ करो, सुरुआत स्वंम करों |
जो अपने आप को नहीं सुधार सकता, वह समाज को क्या सुधारेगा |
तैयार रहो, कान खोलकर, कोई बिना साबुन और पानी के धोने और साफ करने वाला है |
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