Jan 22, 2019

"नेताजी का जादुई कुंठा" -अमित आरम्भ "छत्तीसगढ़िया"

neta ji ka jadui kuntha "नेताजी का जादुई कुंठा" -अमित आरम्भ "छत्तीसगढ़िया"

"नेताजी का जादुई कुंठा" 

एक पते की बात कहें, जब-जब बाजय घण्टा।
नेताजी सब काम को भूले, तब-तब जागे कुंठा।।

कुंठा ऐसी, प्रेम प्यारी, निस दिन, हृदय समाई।
रहय सदा, चिपकन ठिपकन, जैसे बेशर्म घर जमाई।।

किसी की कुंठा मंत्री जैसी, किसी की जैसे सीएम।
टूटे खाट पर चीख के बोले, जैसे 56 इंची पीएम।।

सुआ नृत्य में, गरबा वाली, राउत नाचा में डांडिया।
उसकी संस्कृति उज्वल थाली, अपना बासी, पेज का हंड़िया।।

अपनी भाषा सौतेली वाली, उसकी भाषा प्यारी।
अपना नेता गंवार अनाड़ी, परदेसिया गजब खिलाड़ी।।

महल टिकाके अब भी चिढ़े, जात न मन का मैल।
सारा हक है मार के बैठे,  सिंग नुकीले बैल।।

कुंठा कुंठा धूनी रमाये, बन बैठा मंत्री संतरी।
जाति अभिमान में भूल बैठे, समझ रहे खुद को क्षत्री।।

जैसे कुर्सी पर जमाया पैर, जागा भीतर का कुंठा।
दे दनादन आंच तपाकर, बजा दिया सबका घण्टा।।

कुंठा ऐसी मित्रों वाली, पद, पैसा, पावर वाली।
नीति नियम जब ताक में होंगे, फिर होत घमंड घर खाली।।

जात, पात, अभिमान की कुंठा, प्रतिशोध, अभिमान को माफ करो।
क्या रखा है ऐसी कुंठा में,  ऐसी कुंठा को साफ करो।।

आज करो जी, आज करो, ऐसी कुंठा को साफ करो।।
मिलजुलकर इस धरती पर, एक नवजीवन का निर्माण करो।।

- © Amit K.C.
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