Thursday, August 22, 2019

Statement By Four Authors of 'Kashmir Caged Report
We deeply appreciate the public's keen interest in the 'Kashmir Caged' report and video report.

We all stand by the statement that permission to screen this short video report at the Press Club of India (PCI) on 14 August was denied, reportedly under pressure. Our quarrel is not and was not with the PCI, but with the Government of India that is seeking to censor such spaces. We need to unitedly resist such censorship.

We appeal for sustained solidarity initiatives with the people of Jammu and Kashmir and also with persons all over India who are facing harassment, intimidation, censorship and even house arrest for protesting the treatment meted out to Jammu and Kashmir and its people.

We also object to the misleading and hostile comments made by the Prime Minister, the Government and certain propagandist media outlets, inciting animosity towards Indian citizens who are speaking up against the clampdown on democracy in Kashmir.

We also caution against possible attempts by the government of Pakistan to fish in the troubled waters, sponsor cross-border terror and appropriate the Kashmir issue for its own vested interests.

The voices, concerns, and sufferings of the Kashmiri people must not, yet again, be reduced to an India-Pakistan slanging match. The people of Jammu & Kashmir must have a voice in matters and decisions that concern their lives and region*.

Kavita Krishnan, Jean Drèze, Maimoona Abbas Mollah, Vimal Bhai
(Reference:- E-mail

Statement By Four Authors of 'Kashmir Caged Report
A soul without a body was walking - K.P. Sasi
A soul without a body was walking

A soul without a body was walking
Wondering how much time was left in his life
The corpses on the side of the road
Seemed to be breathing
A man with a chopped hand
Was struggling to ride a bicycle
Women hid their faces
For the shame, others have done to them
The past was best to be forgotten
The rights and wrongs were not to be repeated
The clock was ticking with an unclear sound
How much more time to breathe
Was the most anxious question
The destination was unclear
He put his hand in his pocket
And pulled out a GPS
Pushed the buttons with nervous hands
The screen image came on his hand
It was the image of his hand on the GPS
At the same place where he was standing
The GPS fell down with a thud
Where even ants dared not to walk.

K.P. Sasi is a writer, cartoonist, and filmmaker
अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाने का विरोध
अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाने का विरोध

11 व 16 अगस्त , 2019 को एडवोकेट मोहम्मद शोएब, संदीप पाण्डेय व अन्य साथियों को कश्मीर के लोगों के समर्थन में एक घंटे का मौन मोमबत्ती प्रदर्शन को न होने देने के लिए घरों में ही नजरबंद करने व कल 17 अगस्त, 2019 को अयोध्या में होने वाले दो दिवसीय साम्प्रदायिक सद्भावना पर शिविर में भाग लेने के लिए जाते समय मुम्बई से आए प्रोफेसर राम पुनियानी, संदीप पाण्डेय, राजीव यादव, हफीज किदवई व अन्य को लखनऊ-अयोध्या मार्ग पर रौनाही पर ही रोक लेने तथा अयोध्या के आयोजक महंत युगल किशोर शास्त्री कीे भी गिरफ्तार कर रौनाही ले आने व देश भर से आए शिविरार्थियों को धमकी देकर व दबाव डाल वापस कर भेज कार्यक्रम को न होने देने का हम पुरजोर विरोध करते हैं।

प्रोफेसर प्रताप भानु मेहता का कहना है केन्द्र सरकार ने हाल में जम्मू कश्मीर को पूरी तरह भारत में मिलाने का जो फैसला लिया है यह कश्मीर का भारतीयकरण करने के बजाए भारत का कश्मीरीकरण कर देगा, यह बात सहीं जान पड़ती है। कश्मीर में लोगों के नागरिक अधिकारों का हरण कर लिया गया है व अभिव्यक्ति की आजादी पर पूरी तरह रोक लगी हुई है। श्रीनगर में तो मीडिया पर भी प्रतिबंध लगा हुआ है और समाचारपत्र तक प्रकाशित नहीं हो पा रहे हैं जिससे बाहर के लोग कश्मीर की हकीकत न जान पाएं। ऐसा प्रतीत होता है कि जम्मू-कश्मीर के बाहर भी भारत के अन्य हिस्सों में कश्मीर के सवाल पर यदि कोई सरकार से अलग राय रखता है तो उसे नहीं बोलने दिया जाएगा और कोई कार्यक्रम नहीं करने दिया जाएगा। सिर्फ कश्मीर के सवाल पर ही नहीं अयोध्या में दो दिन की साम्प्रदायिक सद्भावना पर बैठक पर रोक लगाने से तो ऐसा लगता है कि अन्य विषयों पर भी जिसमें भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राय से अलग राय रखी जाने वाली हो पर रोक लगा दी गई है। यह तो आपातकाल जैसी परिस्थिति जान पड़ती है। देश के लिए यह संकेत ठीक नहीं है और यदि जनता इसका विरोध नहीं करेगी तो कल उनके अधिकारों के भी हरण का खतरा है।

आज जम्मू-कश्मीर के लोगों पर उनकी इच्छा के विरुद्ध बिना उनकी राय लिए लोकतंत्र की मौलिक अवधारणा को धता बताते हुए एक फैसला थोप दिया गया है। लोग भ्रमित हैं। फैसला सही भी ठहराया जाए तो उसके लेने का तरीका तो गलत है ही। कल यह सरकार इस तरह के निर्णय अन्य राज्यों के लिए भी ले सकती है। सरकार की तानाशाही का विरोध किया जाना जरूरी है।

       भले ही नरेन्द्र मोदी ने पूर्ण बहुमत से दूसरी बार सरकार का गठन कर लिया हो किंतु लोकतंत्र में बड़े फैसले जो लोगों का जीवन प्रभावित करने वाले हैं, जैसे नोटबंदी, आदि मनमाने तरीके से नहीं लिए जा सकते। उनके ऊपर बहस और आम सहमति बनाना जरूरी है। भारतीय जनता पार्टी को याद रखना चाहिए के उसे देश भर में सिर्फ 37.4 प्रतिशत मतदाताओं का ही समर्थन प्राप्त है। वह यह मान कर नहीं चल सकती कि देश के सभी लोग उसके सभी निर्णयों के साथ हैं। बल्कि बहुमत उसके साथ नहीं है।

       भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपने से अलग राय रखने वालों को नजरअंदाज कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक के एजेण्डे को पूरे देश पर थोपना पूर्णतया गैर-लोकतांत्रिक तरीका है। और इसका विरोध करने वालों की आवाजों को दबाना तो और भी गलत है। हम इस देश में लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए के लिए संकल्पबद्ध हैं और भाजपा सरकार के गैर-लोकतांत्रिक तरीकों के खिलाफ संघर्ष करते रहेंगे।
मोहन भागवत के इस कथन की "आरक्षण पर राष्टीय बहस" होनी चाहिए को एससी/एसटी हल्के में ले सकते है लेकिन में गम्भीरता से लूंगा
मोहन भागवत के इस कथन की "आरक्षण पर राष्टीय बहस" होनी चाहिए को एससी/एसटी हल्के में ले सकते है लेकिन में गम्भीरता से लूंगा क्योकि आरएसएस व भाजपा की इस बात में तारीफ कर सकता हूँ कि वो अपनी विचारधारा पर पूरी तरह से अडिग है और उसी के अनुसार कार्य कर रही है, बहुजन समाज की पार्टियो व संगठनों की तरह अपनी विचारधारा से समझौता नही करते है। अब;

"अगर सरकार सँविधान संशोधन बिल नही लाई तो आरक्षण 26 जनवरी 2020 को खत्म हो जाएगा। The Constitution (Ninety-fifth Amendment) Act, 2009 प्रभावी 25 जनवरी 2010 को हुआ था जिसकी मियाद 10 वर्ष थी जो कि 26 जनवरी 2020 को पूरी हो रही है"

वैसे राजनैतिक आरक्षण को खत्म करना इतना आसान नही है। इसलिए मनोवैज्ञानिक तौर पर देश मे एक माहौल का निर्माण किया जाएगा। इसमे एससी/एसटी अलग थलग भी पड़ सकते है। मीडिया में अब पूर्व नियोजित इसी प्रकार की डिबेट करवाई जाएगी, उसमे दिखाया जाएगा कि जातिवाद का कारण राजनैतिक आरक्षण ही है। मेरा व्यक्तिगत यह मानना है की मोहन भागवत का बयान इसी कड़ी की शुरुआत है। 

भागवत ने जैसे ही आरक्षण पर राष्टीय बहस के बारे में  कहा, सरकार समर्थित मीडिया ने इस पर बहस भी शुरू कर दी है।  हेडलाइन लगाई है कि "क्या आरक्षण को ख़त्म करने का समय आ गया है?."

वैसे मुझे पूरी उम्मीद है कि आरक्षण अब ज्यादा दिन नही चलेगा। एसटी के युवाओं में अब फर्जी राष्ट्रवाद का इंजेक्शन लगाया जा चुका है। वो ज्यादा विरोध भी करेंगे। 

और जिस प्रकार अनुच्छेद 370 हटाने पर मीडिया यह कह रही है कि;

1.कश्मीर के लोगो को आजादी अब जाकर मिली है।
2.कश्मीर के लोग इसके हटने से खुशी में झूम रहे है। 

उसी प्रकार मीडिया यह कहेगी की;

1.एससी/एसटी को जातिवाद से अब जाकर आजादी मिली।।
2.जातिवाद के जड़ राजनैतिक आरक्षण की वजह से काफी जातिवाद झेलना पड़ा, अब जाकर उन्हें समाज मे बराबरी का हक मिला है। 
3.एससी एसटी के लोग आरक्षण हटने से खुशी में झूम रहे है।
4.दो चार फर्जी एससी/एसटी के लोगो को दिखा देगी जो कि जश्न मना रहे होंगे। 

आप देखते रहे ऐसा ही होगा और एससी एसटी के नौजवान "वाह वाह" कहेंगे।
Social Media News Resived
सामुदायिक वन संसाधन अधिकरों की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़ । छत्तीसगढ़ का पहला सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) ग्राम जबर्रा को
सामुदायिक वन संसाधन अधिकरों की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़ । छत्तीसगढ़ का पहला सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) ग्राम जबर्रा को
दुगली(छत्तीसगढ़)- प्रदेश में पहली बार वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम 2006 के अन्तर्गत सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) छत्तीसगढ़ में पहली बार ग्राम जबर्रा (विकासखंड नगरी, जिला धमतरी) में आज प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री राजीव गांधी के 75 जयंती के अवसर पर धमतरी के वनांचल दुगली में आयोजित ग्राम सुराज और वनाधिकार मड़ई में जबर्रा ग्राम सभा को वनाधिकार पत्र प्रदान किया। जबर्रा में 5352 हेक्टेयर क्षेत्र जंगल मे आदिवासियों को जंगल में संसाधन का अधिकार के तहत सामुदायिक वन संसाधन अधिकार दिया गया। इसके साथ ही ग्राम सभा को अपनी पारंपरिक सीमा क्षेत्र के अंदर स्थित जंगल के सभी संसाधनों पर मालिकाना हक मिलेगा और जंगल,जंगल के जानवरो के साथ -साथ जैव विविधता की सुरक्षा संरक्षण ,प्रबंधन और उनको पुर्नजीवित करने के लिए अधिकार मिलेगा। 

जबर्रा ग्राम, जो कि अपने औषधीय पौधों के लिए विख्यात है को 5,352 हेक्टेयर में, सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) कि मान्यता दी गई।  यह क्षेत्र वन विभाग के 17 कक्ष (कम्पार्टमेंट) तथा 3 परिसर (बीट) में फैला हुआ है। सामुदायिक वन संसाधन अधिकार देने में अब छत्तीसगढ़ का नाम भी जुड़ गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार केवल सात राज्यों में ही ये अधिकार लागू हो पाया है. आदिवासियों के लिए उपलब्ध किए जा सकने वाले वनक्षेत्र का 15 फीसदी महाराष्ट्र, 14 फीसदी केरल, 9 फीसदी गुजरात, 5 फीसदी ओडीशा, 2 फीसदी झारखंड, 1 फीसदी कर्नाटक में दिया जा सका है. देश भर में कुल तीन फीसदी वनक्षेत्र पर ही ये अधिकार मंजूर किए गये हैं.

सामुदायिक वन संसाधन अधिकरों की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़ । छत्तीसगढ़ का पहला सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) ग्राम जबर्रा को
सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) का मतलब: 

सामुदायिक वन संसाधन अधिकार मतलब ग्राम सभा को अपनी पारंपरिक सीमा के अंदर स्थित जंगल के सभी संसाधनों पर मालिकाना हक। इस अधिकार का दावा करने के लिए ग्राम की पारंपरिक सीमा का राजस्व, पंचायत अथवा वन विभाग द्वारा निर्धारित सीमा के अनुरूप होना जरूरी नहीं है।

सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) का दावा शुरू करने की प्रक्रिया: 

दावा करने हेतु ग्राम सभा द्वारा अपने वन अधिकार समिति को इस हेतु अधिकृत किया जाता है। वन अधिकार समिति इसके बाद अपने ग्राम की सीमा से लगे सभी ग्रामों के वन अधिकार समितियों के अध्यक्ष तथा सचिवों की बैठक बुलाती है। इस बैठक में ग्राम के बुजुर्ग व्यक्ति तथा पारंपरिक मुखिया जैसे पटेल, गायता, ठाकुर, बैगा, इत्यादि को भी बुलाया जाता है जो पारम्परिक सीमाओं का विशेष रूप से ज्ञान रखते हो।

सामुदायिक वन संसाधन अधिकरों की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़ । छत्तीसगढ़ का पहला सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) ग्राम जबर्रा को
नजरी नक्शा तैयार करना तथा स्थल सत्यापन:
सामुदायिक वन संसाधन अधिकरों की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़ । छत्तीसगढ़ का पहला सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) ग्राम जबर्रा को
इसी बैठक में दावा करने वाले ग्राम का नजरी नक्शा तैयार किया जाता है जिसमें उस गांव की पारंपरिक सीमा का निर्धारण सभी ग्रामों की वन अधिकार समितियों की सहमति से किया जाता है। इस नजरी नक्शा के अनुसार गांव की पारंपरिक सीमा का सत्यापन करने तथा उसके भीतर का क्षेत्रफल निकालने हेतु एक तिथि तय की जाती है जिसकी सूचना संबंधित ग्राम की वन अधिकार समिति द्वारा सीमावर्ती सभी ग्रामों के वन अधिकार समितियों को तथा उपखंड स्तरीय समिति को लिखित में दी जाती है। साथ ही वन विभाग, राजस्व विभाग तथा पंचायत विभाग के मैदानी कर्मचारियों जैसे वनरक्षक, पटवारी तथा पंचायत सचिव को भी इसकी लिखित सूचना दी जाती है जिससे वह स्थल सत्यापन के समय उपस्थित रह सके।

निर्धारित तिथि को वनरक्षक, पटवारी एवं पंचायत सचिव की मौजूदगी में जीपीएस मशीन द्वारा गांव की परंपरागत सीमा का सीमांकन किया जाता है तथा कुल क्षेत्रफल नापा जाता है। सीमांकन के दौरान सीमा से लगने वाले ग्रामों के वन अधिकार समितियों के सदस्य उपस्थित रहते हैं जिससे भविष्य में सीमा को लेकर कोई भी विवाद की आशंका नहीं रह जाती है। इस प्रक्रिया से प्राप्त जीपीएस नक्शा तथा नजरी नक्शा को समीपवर्ती ग्राम की वन अधिकार समितियों द्वारा हस्ताक्षर कर पुनः सत्यापित किया जाता है।

CFR हेतु साक्ष्य तथा ग्राम सभा में दावा पारित करना:

दावा करने वाले ग्राम की वन अधिकार समिति द्वारा इसके उपरांत वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत बनाए गए नियम 13 मैं दर्शाए गए कम से कम 2 साक्ष्य को लगाते हुए अपना दावा तैयार किया जाता है। इसमे मुख्य रूप से वन विभाग के पुराने दस्तावेज जैसे कार्य योजना, प्रबंध योजना, वन ग्राम से राजस्व ग्राम परिवर्तन कि अधिसूचना, संयुक्त वन प्रबंधन समिति के गठन के दस्तावेज, जमाबंदी रि
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कॉर्ड, बुजुर्गो का कथन, आदि लगाया जा सकता है। यह दावा वन अधिकार समिति द्वारा अपनी ग्राम सभा के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। ग्राम सभा यह दावा को 50% कोरम में पारित करती है जिसमें एक तिहाई महिला सदस्यों की उपस्तिथि अनिवार्य है।

CFR प्रस्ताव का उपखंड स्तरीय समिति तथा जिला स्तरीय समिति द्वारा अनुमोदन

ग्राम सभा के अनुमोदन के उपरांत दावा उपखंड स्तरीय समिति को भेज दिया जाता है जो की जांच के उपरांत दावे को अपनी अनुशंसा सहित जिला स्तरीय समिति को अग्रेषित कर देती है। दावा सही पाए जाने पर जिला स्तरीय समिति दावे का अनुमोदन करते हुए इसे स्वीकृत करती है एवं सामुदायिक वन संसाधन अधिकार का प्रमाण पत्र जारी करती है। साथ ही इसे संबंधित विभागों द्वारा अपने अपने रिकॉर्ड में भी अद्यतन किया जाता है।

सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) मिलने पर ग्राम सभा के अधिकार: 

ग्राम सभा सामुदायिक वन संसाधन अधिकार मिलने पर जंगल, जंगली जानवर तथा जैव विविधता की सुरक्षा एवं संरक्षा तथा उसको पुनर्जीवित एवम् प्रबंधन करने के लिए अधिकृत हो जाती है। ग्राम सभा इस हेतु वन अधिकार नियम 2007 की नियम 4 (1) (ड) के अंतर्गत ग्राम वन प्रबंधन समिति भी बना सकती है।

ग्राम सभा वन के प्रबंधन के लिए अपनी कार्ययोजना, प्रबंध योजना, तथा सूक्ष्म योजना स्वयं से, स्थानीय लोगों द्वारा समझ सकने वाली भाषा में, तैयार कर सकती है। साथ ही ग्राम सभा वन विभाग द्वारा तैयार किए जाने वाले कार्य योजना, प्रबंधन योजना तथा सूक्ष्म योजना में संशोधन प्रस्तावित कर सकती है जिसे वन विभाग द्वारा नियमानुसार प्रक्रिया में लिया जायेगा तथा संशोधन किया जायेगा।

सामुदायिक वन संसाधन अधिकरों की ओर बढ़ता छत्तीसगढ़ । छत्तीसगढ़ का पहला सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) ग्राम जबर्रा को
ग्राम सभा सामुदायिक वन अधिकार अधिनियम की धारा 5 के अनुसार वन संसाधनों तक पहुंच को भी विनयमित कर सकती है तथा ऐसे क्रियाकलापो को रोक सकती है जो वन्य जीव, वन और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। साथ ही ग्राम सभा वन निवासीयों के निवास को किसी भी विनाशकारी व्यवहार से संरक्षित करने हेतु कदम उठा सकती है जो उनकी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को प्रभावित करते हैं।


@तामेश्वर सिन्हा।

Wednesday, August 21, 2019

फसल बीमा :भ्रष्टाचार निजी मामला कैसे, पूछा किसान सभा ने
फसल बीमा :भ्रष्टाचार निजी मामला कैसे, पूछा किसान सभा ने

छत्तीसगढ़ किसान सभा ने वर्ष 2014 में फसल बीमा योजना में तत्कालीन कृषि आयुक्त और प्रदेश के पूर्व सचिव अजयसिंह द्वारा किये गए भ्रष्टाचार की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत सार्वजनिक न करने के राज्य सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि भ्रष्टाचार इस अफसर का निजी मामला कैसे हो सकता है?

आज यहां जारी एक बयान में छग किसान सभा के अध्यक्ष संजय पराते और महासचिव ऋषि गुप्ता ने आरोप लगाया है कि फसल बीमा योजना में भाजपा नेता प्रतापराव कृदत्त के साथ मिलकर की गई गड़बड़ियों की कांग्रेस सरकार पर्दापोशी कर रही है और यही कारण है कि ईओडब्ल्यू को जांच करने की अनुमति देने के बजाए कृषि विभाग ने मामला सामान्य प्रशासन विभाग के पाले में डाल दिया है।

किसान सभा नेताओं ने कहा कि यह हास्यास्पद है कि जिस व्यक्ति पर भ्रष्टाचार का आरोप है, उसी व्यक्ति से भ्रष्टाचार से संबंधित कागजातों को सार्वजनिक करने के लिए सहमति मांगी जा रही है, जबकि घोटाले में शामिल बीमा कंपनियों के खिलाफ कृषि विभाग पहले ही वसूली के आदेश दे चुका है।

किसान सभा ने मांग की है कि इस भ्रष्टाचार की जांच बिना हीला-हवाले ईओडब्ल्यू को सौंपी जाएं और शिकायतकर्ता आवेदक को प्रकरण की पूरी फ़ाइल सौंपी जाएं।

Thursday, August 15, 2019

फेस बुक खाता खोले, Naya Facebook Account Banaye How to create new facebook Account
How to create a new facebook account facebook me naya khata kholna hai facebook me naya id banana hai.jpg

फेसबुक क्या है,
फेसबुक एक सामाजिक सेवा वेबसाइट है, जिस पर लोग अपना अकाउंट बनाते है,
और बहुत सारे फेसबुक, ग्रुप, पेज से और मित्रो से जुड़ते है,
facebook में यूआरएल को लिंक किया जा सकता है,
फोटो को डाला जा सकता है,
विडिओ को डाला जा सकता है,
ऑडियो और बहुत कुछ को डाला जा सकता है,
और उसे एक दुसरे को शेयर कर सकते होते है और कमेंट भी कर सकते है,
आज के समय हर कोई का facebook खाता है,
चाहे वह किसी व्यक्ति का हो, किसी संगठन जैसे
स्कूल कालेज, कोई कंपनी या कोई समाज |
तो आप आप जाने की कैसे अपना facebook खाता खोल सकते है,
इसके लिए कोई कोर्स करने की कोई जरुरत नहीं है,
धीरे धीरे आप सब सिख जायेंगे |

खाता बनाने के लिए,




नीचे लिंक को ओपन करें
www.facebook.com
facebook create account

Frist Name लिखे उसके जगह में इसी तरह से
SurName,
Mobile Number Ya Email ID
डाले,
अपना जन्म दिनांक डाले,
आप महिला है या पुरुष या सेलेक्ट करे,
और Create Account में क्लिक करे,
आपने जो मोबाइल या ईमेल डाला है उसमे OTP पासवर्ड जायेगा उसे डाले आपका
facebook खाता तैयार है, आप अपना फोटो और प्रोफाइल को सेट कर लेवे, |

Wednesday, August 14, 2019

मंत्रिमंडल के निर्णय :  ग़रीबों की कीमत पर अमीरों की चांदी -- माकपा
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अमीरों के कब्जे वाली नजूल जमीन को उन्हें सौंपने तथा संग्रहण केन्द्रों पर रखे लाखों टन अनाज का उपयोग इथेनोल बनाने के लिए करने के मंत्रिमंडल के निर्णय की तीखी आलोचना की है तथा इसे गरीबविरोधी और अमीरपस्त बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है.

आज यहां जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिवमंडल ने कहा है कि नजूल जमीन पर बसे ग़रीबों को आवासीय हक देने की जगह कांग्रेस सरकार राजनेताओं, ठेकेदारों, रियल बिल्डर्स और अधिकारियों  के हजारों फुट जमीन पर अवैध कब्जों को वैध करके उन्हें सौंपने का काम कर रही है. यह सीधे-सीधे इन तबकों के अवैध कामों को राजनैतिक संरक्षण देना और अमीरों के आगे घुटने टेकना ही है. यही कारण है कि पिछले दिनों जमीन की सरकारी दरों को कम किया गया है. इससे भूमि अधिग्रहण की चपेट में आने वाले किसानों को तो नुकसान होगा, लेकिन रियल स्टेट बिल्डर्स और बड़े कब्जेदारों की चांदी होगी.

माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने धान और गन्ने से इथेनोल बनाने के फैसले पर भी कड़ी आपत्ति की है. उन्होंने कहा कि प्रदेश में आज भी आधी आबादी कुपोषित है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली तक पहुंच से लाखों परिवार वंचित हैं. इस वर्ष आधा राज्य और तीन-चौथाई किसान वर्षा की कमी और अनियमित वर्षा के कारण सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हैं. इससे अनाज उत्पादन में गिरावट आने वाली है और इस अतिरिक्त अनाज भंडारण से 15 लाख परिवारों का पूरे साल भरण-पोषण किया जा सकता है. ऐसे में खाद्य भंडारण को एल्कोहोल बनाने के लिए खोलना, जिसका अधिकांश शराब बनाने के लिए उपयोग किया जाएगा, अदूरदर्शितापूर्ण कदम ही कहा जाएगा.

माकपा नेता ने मांग की है कि इस अतिरिक्त अनाज को सार्वभौमिक वितरण प्रणाली जरिये राज्य के सभी जरूरतमंद नागरिकों को उपलब्ध कराया जाए तथा 'काम के बदले अनाज' योजना चलाकर ग्रामीण व शहरी अधोसंरचना को मजबूत करने के लिए इसका उपयोग किया जाए. इससे प्रदेश से पलायन रोकने में भी मदद मिलेगी.
किसानों को साहूकारी कर्ज़ से मुक्त करने की मांग की किसान सभा ने
मध्यप्रदेश में सभी आदिवासियों पर चढ़े साहूकारी कर्ज़े को माफ करने तथा उनकी गिरवी रखी जमीन और जेवर वापस करवाने की स्वागतयोग्य घोषणा मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर की है। इसके बाद छत्तीसगढ़ किसान सभा ने छत्तीसगढ़ में भी किसानों को उन पर चढ़े साहूकारी कर्ज़े से मुक्त किये जाने के लिए कदम उठाने की मांग कांग्रेस की बघेल सरकार से की है।

आज यहां जारी एक बयान में छग किसान सभा के अध्यक्ष संजय पराते और महासचिव ऋषि गुप्ता ने कहा है कि नाबार्ड के अनुसार प्रदेश में भूमिहीन आदिवासियों सहित लगभग 37 लाख परिवार सरकारी ऋण योजना के दायरे से बाहर हैं, जो खुले बाजार या साहूकारों से कर्ज लेते हैं। उन पर औसतन 50 हजार रुपयों का कर्ज चढ़ा हुआ है, जिसका अधिकांश साहूकारी कर्ज़ों का ही है। ऐसे में केरल की तर्ज़ पर किसान ऋण मुक्ति आयोग बनाकर उन्हें इन कर्ज़ों से छुटकारा दिलाया जा सकता है।

किसान नेताओं ने देरी से हुई वर्षा और अल्पवर्षा से पैदा अकाल की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की है और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल उठाये जाने वाले अनेकानेक कदमों में से एक के रूप में मनरेगा के जरिये  ग्रामीण किसानों को रोजगार दिए जाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि आधा राज्य   और तीन-चौथाई किसानों की फसल सूखे से प्रभावित है। इससे राज्य के विकास दर में भी गिरावट आएगी और पलायन बढ़ने की आशंका है। इसके मद्देनजर किसानों को राहत देने के हर संभव उपाय किये जाने की जरूरत है।
अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के खिलाफ पूरे प्रदेश में वामपंथी पार्टियों ने आयोजित किया नागरिक-प्रतिवाद
अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के खिलाफ पूरे प्रदेश में वामपंथी पार्टियों ने आयोजित किया नागरिक-प्रतिवाद

अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के खिलाफ पूरे प्रदेश में वामपंथी पार्टियों ने आयोजित किया नागरिक-प्रतिवाद

छत्तीसगढ़ की पांच वामपंथी पार्टियों ने संविधान के अनुच्छेद 370 और 35-ए को खत्म करने तथा जम्मू-कश्मीर राज्य को विभाजित करने के केंद्र सरकार के कदम को देश के संघीय ढांचे, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और कश्मीरियत पर खुला हमला बताते हुए पूरे राज्य में आज नागरिक-प्रतिवाद प्रदर्शन आयोजित किया। रायपुर में हुए प्रदर्शन में माकपा के संजय पराते, एम के नंदी, बी सान्याल, धर्मराज महापात्र, भाकपा के विनोद सोनी, भाकपा (माले-लिबरेशन) के बृजेन्द्र तिवारी, भाकपा (माले-रेड स्टार) के सौरा यादव, तेजराम साहू और एसयूसीआई (सी) के विश्वजीत हरोड़े, आत्माराम साहू के नेतृत्व में विभिन्न संगठनों से जुड़े सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। भिलाई में नागरिक प्रतिवाद की अगुआई वकील भारती, शांत कुमार, डीवीएस रेड्डी, अशोक खातरकर, योगेश सोनी (माकपा), बृजेन्द्र तिवारी (भाकपा-माले-लिबरेशन), कलादास डहरिया, आई के वर्मा आदि ने की। ये नागरिक प्रदर्शन सरगुजा, सूरजपुर, छाल (रायगढ़) आदि जगहों पर भी आयोजित किये गए तथा राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपे गए।

वामपंथी नेताओं ने यहां आयोजित सभाओं को संबोधित करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में विलय की प्रक्रिया अन्य देशी रियासतों के विलय से भिन्न थी, इसीलिए कश्मीर की जनता की अस्मिता, पहचान और स्वायत्तता की रक्षा का वादा तत्कालीन भारत सरकार ने किया था और इसे पूरा करने के लिए संविधान में धारा 370 का प्रावधान किया गया था। इसलिए मोदी सरकार का यह कदम न केवल जम्मू-कश्मीर की जनता के साथ विश्वासघात है, बल्कि राष्ट्रीय एकता व संघीय गणराज्य की अवधारणा पर ही हमला है, जो देश में किसी भी प्रकार की विविधता को बर्दाश्त करने के लिए ही तैयार नहीं है।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार का यह कदम पारस्परिक राजनैतिक संवाद के जरिये कश्मीर समस्या को हल करने के उसके वादे के भी खिलाफ है, जो उसने संसद में तीन साल पहले दिया था। इसके बजाय उसने मुख्य राजनैतिक पार्टियों के नेताओं को गिरफ्तार करने व जनता की आवाजाही को प्रतिबंधित करने का ही तानाशाहीपूर्ण कदम ही उठाया है। इससे घाटी में अलगाववाद की भावना और मजबूत होगी।

धारा 370 हटाने के लिए दिए जा रहे तर्कों को बेनकाब करते हुए वाम नेताओं ने कहा कि मोदी सरकार ने ही जून महीने में नागालैंड में अलग झंडे, अलग पासपोर्ट पर सहमति दी है और धारा 370 जैसे प्रावधान ही धारा 371 के रूप में नागालैंड, असम, मणिपुर, आंध्रप्रदेश, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा व हिमाचल प्रदेश में लागू है, जहां बाहरी प्रदेश का कोई निवासी जमीन नहीं खरीद सकता।वामपंथी पार्टियों ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने दरअसल जम्मू-कश्मीर को विभाजित करने के मुस्लिमविरोधी संघी एजेंडे को ही लागू किया है।

पांचों वामपंथी पार्टियों ने अपने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलने श्रीनगर गए माकपा महासचिव सीताराम येचुरी और भाकपा महासचिव डी राजा की गिरफ्तारी और उन्हें शहर में प्रवेश न देने की भी तीखी निंदा की है।

संजय पराते, सचिव, माकपा, 
(मो) 094242-31650
बृजेन्द्र तिवारी, सचिव, भाकपा (माले-लिबरेशन), 
(मो) 07000220358
सौरा यादव, सचिव, भाकपा (माले-रेड स्टार)
(मो) 09425560954
आरडीसीपी राव, सचिव, भाकपा, (मो) 09425591666
विश्वजीत हरोड़े, सचिव, एसयूसीआई (सी)
(मो) 09981490802