Dec 21, 2018

सतनाम धर्म, सतनाम पंथ, सतनामी उत्थान में बाधक है, सरनेम और उपनाम लिखना : योगेन्द्र कुमार

satanm dharm sanami utthan satnami samaj me badhak hai sarnem #Yogendra Kumar.jpg

सच बात कितनी कड़वी होती है, और इससे भी अधिक कड़वी होती है, सत्य को स्वीकार करना |
एक समय था, जब धूर्त मनु ने लोगो को बाँटने के लिये जाति का निर्माण किया, आज लोग जाति में बंटे हुए है, इनको तो यह भी नहीं पता की जाति में वो बाँटकर इन लोगो को तोड़ कर राज कर रहे है |

      और ये आपस में न जुड़ पाए, इस तरह सडयन्त्र किया, मेरा जाति बड़ा, इसी तरह से आपस में लड़ते रहे, पर ये कभी एक होने की नहीं सोचेंगे |

      जाति में बाँटा सो बाँटा अब ये लोग गोत्र को पकड़ लिए है, पहले मनु ने बाँटा अब ये आपस में खुद सरनेम को गोत्र को बढ़ावा देकर जाति से भी बड़ी मानसिकता सरनेम को पकड़ लिए है |

      आज अगर सतनामी की बात करें तो, वास्तविक सरनेम 100 कुछ होंगे, पर आज के समय में सभी अपनी एक गोत्र को अनेक नाम दे रहे है, इस तरह से एक सतनामी 1000 गोत्र में बंट गया है |

     जब कोई भी किसी गाँव में जाता है, तो जानने की कोशिश करता है, यहाँ कितने सतनामी रहते है, फिर ओ अपनी गोत्र के लोगो को जानने की कोशिश करता है, यहाँ इस सरनेम के कितने लोग रहते है |

     उसके मन यह भावना होती है, की यह गोत्र वाले मेरे अपने है, तो क्या वह पूरा सतनामी तुम्हारा अपना नहीं |
सरनेम, उपनाम, गोत्र, क्या है ?

    प्रारम्भिक समय में जब कोई कुछ ऐसा कर्म करता था, की वाह-वाही का पात्र हो, तो लोग उसे उत्साह वर्धन करने के लिए, उसे कुछ सम्बोधन नाम देते थे, जैसे अगर किसी ने बाघ मार कर किसी का जान बचाया हो, या बाघ का शिकार किया हो उसे, कहेंगे बाघमारे |

सरनेम की आवश्यकता कब होती है ?

     गोत्र या सरनेम की शुरुआत एक परिवार से होती है, इस अनुसार से यह माना जाता है, एक गोत्र के सभी परिवार हुए,
    आज के समय में पुराने सरनेम का कोई महत्व नहीं रहा, बस इतना है, जब विवाह होने वाला हो, तो यह देखा जाता है, लड़का और लड़की का सरनेम एक गोत्र का तो नहीं, जब एक हो जाता है तो, सम्बन्ध में भाई बहन मान लिया जाता है |

 लेकिन यह धारणा को इस अनुसार से देखते है,
महिला और पुरुष का जब विवाह होता है, तो महिला का सरनेम बदलकर पुरुष का जो सरनेम होता है, वह हो जाता है,
उदाहरण
महिला का सरनेम ( धरती )
पुरुष का सरनेम ( आकाश )
विवाह के बाद दोनों का ( आकाश ) पुरुष प्रधान में,
बच्चों का सरनेम ( आकाश ) होगा |
अब दुसरे परिवार का एक दूसरा लड़का है जिसका सरनेम ( धरती ) है,
वह आकाश नाम के सरनेम वाली लड़की से विवाह करना चाहता है,
तो यहाँ विवाह तो हो रहा है | फिर सरनेम का क्या वजूद
आज सतनामी का 1000 सरनेम हो गया है,

       जब किसी से नाम पूछा जाता है, तो नाम के साथ वह सरनेम भी बताता है, और वह फिर कहता है, यह कौन से जाति में आता है, या धर्म, ये क्या है, मेरे समझ से तो परे है |
     आज लोग अपनी विरादरी को पहचान नहीं कर पा रहे |
लगातार टूट रहे है |

    आज जितने गोत्र को लोग जानते है, अगर भारत के राज्यों का, अपने जिलो का, विधानसभा एरिया का नाम जानने में लगाया होता तो, बहुत बड़ा प्राणी हो गया होता |

      अगर सतनामी पंत है, तो सरनेम को इस पंत में कही महत्त्व भी नहीं दिया गया है |
और अगर सतनामी का धर्म सतनाम है, तो सतनामी क्या है ?

     सतनाम धर्म के अनुसार मानव-मानव एक बराबर है, जाति भेद, ऊँच नीच का यहाँ कोई स्थान नहीं, कोई भी मानव सतनाम धर्म को स्वीकार कर सकता है, तो बताओ अगर कोई बौद्ध परिवार सतनाम धर्म स्वीकार करता है, तो वह अपना सरनेम क्या लिखेगा |

     जिस तरह से यशवंत जी सतनामी लिखते है, मिलेचरण के पुरखा पहले यादव थे, अब सतनामी लिखते है |
तो आप क्यों नहीं लिखते ?

      मै तो उन लोगो को ही असली सतनामी कहता हूँ, जो सरनेम में सतनामी लिखता है |
अगर सभी मानव एक बराबर है, तो सबका सरनेम भी एक होना चाहिए, इस अनुसार से सभी सतनाम धर्म के लोगो का सरनेम भी एक सतनामी होना चाहिए |

      बात फिर आ जाता है, विवाह का तो इसका उपाय यह हो सकता है, लड़के और लड़की का विवाह होने से पहले रिश्तेदारी में यह देखा जाए, कही दोनों में कोई भाई बहन का अन्य संबध तो नहीं |

    माता पिता ने बच्चों को सिर्फ नाम दिया होता है, ये सरनेम जबरदस्ती मिला होता है, इस अनुसार से नाम का महत्व होना चाहिए, सरनेम का नहीं |

     आज के समय में कोई किसी का नाम नहीं जानता, कहते फिरते है, और अंडे जी, मंडे जी, सन्डे जी को देखा, ये क्या है,
नाम के महत्व को निचा दिखाना, और मनुवाद को बढ़ावा देना |
मैंने तो अपना सरनेम नाम से हटा लिया है,
लिखने में भी सतनामी ही लिखूंगा |
समय आएगा तो भारतीय लिखूंगा |

पर मुझे मेरे नाम से गाँव के नाम से माता पिता के नाम से जानना |

कोई दुसरे समाज के लोग कहेंगे, अब योगेन्द्र तू जाति वादी हो गया |
मै कहूँगा, आप भी मेरी तरह कहें और करें,
मुझे अपने अनुसार से मन पसंद किसी धर्म, किसी जाति से विवाह करने का पूरा छुट समाज की तरफ से मिला है,
क्या आपको मिला है ?
मैंने तो सबको एक बराबर देखा है, मुझसे मेरा जाति न पूछना, मेरी कोई जाति नहीं, मेरा धर्म न पूछना, मानवता ही मेरा धर्म है,
मुझसे गोत्र न पूछना, मै गोत्र नहीं मानता |
तो सतनामी क्या है ? सत्य में चलने का मार्ग |
- सादर विचार योगेन्द्र कुमार फेसबुक से जुड़े Yogendra Kumar
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