Nov 5, 2018

संत शिरोमणि गुरुघासीदास बाबा जी पर निबंध और पूरी कहानी उपदेश, हर एक चीज पूरा विस्तार से

आज आपको विश्व के उस महान संत के बारे में बताने जा रहा हूँ, जिसने जीवन की वास्तविकता से बोध कराया और जीवन जीने का वास्तविक सत्य का मार्ग बताया |
संतो में सबसे श्रेष्ट संत शिरोमणि गुरुघासीदास बाबा का जन्म, पहाड़ो की गोद में, गिरौदपूरी नामक गाँव में, संत 18 दिसम्बर, 1756 को हुआ था |
इनके पिता का नाम, महंगू दास, और माता का नाम अमरौतिन बाई |
बाबा जी के पत्नी का नाम माता सफुरा, और बाबा जी के बच्चे |
गुरूघासीदास बाबा के पूर्वज नारनौल पंजाब, से हुए सोना खान इस तरह से कई पीढ़ी बाद इनके पूर्वज गिरौधपुरी में आये थे |
गुरुघासीदास बाबा जब कुछ 30 वर्ष के थे, तो उन्होंने अपने ज्ञान को जगाने के लिए ध्यान साधना में लीन हो गए, इस तरह से 6 माह तक धयान किये |
तब जाकर गुरुघासीदास बाबा को ज्ञान की प्राप्ति हुई |
गुरुघासीदास बाबा के बारे में बाबा साहेब आंबेडकर ने अंग्रेजो द्वारा लिखी पुस्तक के माध्यम से जाना |
गुरुघासीदास बाबा को छत्तीसगढ़ का विशेष संत का दर्जा और गुरुघासीदास सम्मान और अनेक सम्मान है |
तो जानते है क्या है वह ज्ञान |
sant shiromani gurughasidas baba ji ki puri kahani pura vistar se jane

गुरूघासीदास बाबा के उपदेश और सतनाम सन्देश 

हम वास्तव में जानते है, की यह जाति धर्म भेद भाव सभी इन मानव ने बनाई है,
इसी वास्तविकता को गुरुघासीदास बाबा ने सबको बताया की,
1. सभी मानव एक समान होते है |
कोई जाति से धर्म से बड़ा नहीं होता, यह सभी राज करने के लिए भेद बनाया है | किसी प्रकार की जाति धर्म न मानो, जो मानव मानव में भेद बताये उसे न मानो |
2. मांस भक्षण न करो |
गुरुघासीदास बाबा ने कहो की मांस भक्षण न करो, मानव मांस खाने के लिए नहीं है, शाकाहारी रहो |
3. मूर्ति पूजा मत करों |
गुरुघासीदास बाबा ने कहाँ की पत्थर को पूजने से कुछ नहीं मिलेगा, अगर किसी को पूजना है तो माता पिता गुरु को पूजो, जिनसे तुम्हे ज्ञान मिलता है, पत्थर न तो बोलेंगे, न खायेंगे, और न कुछ ज्ञान देंगे |
4. नशा खोरी शराब अन्य नशा का सेवन न करों |
नशा का सेवन करने से दिमाग ख़राब हो जाता है, मानसिक और शाररिक विकास नहीं होता, इसलिए नशाखोरी का कार्य न करों |
5. चोरी न करों |
गुरुघासीदास बाबा ने चोरी करने के लिए मना किया है, क्योकि दुसरे के चीजो लेने से वह अपना नहीं हो जाता, इसलिए मेहनत से, अपने दम पर प्राप्त करने के लिए कहा है |
6. जुआ न खेलो |
गुरुघासीदास बाबा ने जुआ खेलने के लिए मना किया है, क्योकि जुआ का धन अपने मेहनत का नहीं होता, और वह पैसा सुख भी नहीं देता |
7. दुसरे की स्त्री पर नजर न लगाओ |
गुरुघासीदास बाबा ने अपना चरित्र सुधारने का सन्देश जन जन को दिया है |
गुरुघासीदास बाबा ने और हजारो सन्देश दिए है मगर, ये 7 सन्देश बहुत महत्वपूर्ण है,
जीवों पर दया करो, इन्हें न खाओ |
इन जानवरों जन्तुओ पर अत्याचार न करो |

गुरुघासीदास बाबा के जन्म स्थान के विषय में,

सन 1756 में भारत देश में किसी प्रकार का कोई राज्य नहीं था, इसलिए हम नहीं कह सकते की गुरुघासीदास बाबा का जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ या, छत्तीसगढ़ के संत है |
वास्तव में कोई भी ज्ञान का क्षेत्र नहीं होता, संतो की कोई जाति या धर्म नहीं होता ओ सबके लिए एक समान होते है, इसलिए यह बिलकुल भी नहीं कहना चाहिए की ये इस समाज से आते है |

गुरुघासीदास बाबा का सतनाम आन्दोलन,

गुरुघासीदास बाबा ने रावटी चलाकर सतनाम का सन्देश जन जन को दिया है, और पुरे छेत्र में जा जाकर सत्य के सन्देश का प्रचार किया है |
उस समय की स्तिथि को आज के माहौल से थोड़े से समझ सकते है,
आज भी देखो दुसरे समाज का दुसरे समाज के साथ खुलकर शादी नहीं हो पा रही है, इसलिए आज भी छुआ छुत का माहौल बना हुआ है, आज लोग मंदिर में माथा पटक कर मर रहे है, पत्थर को जायदा माता पिता को गुरु को कम सम्मान दे रहे है |
अगर रास्ते कोई देवी का पत्थर और उसी उसके बगल ने अपनी जन्म देने वाली माता क्यों न हो, कुछ तो ऐसे है, जो पहले मूर्ति को उठा लेंगे मगर जिन्दा मानव को नहीं |
तो सोचो उस समय क्या रहा होगा |

लोग गुरूघासीदास बाबा को चमत्कारी भी मानते है |

उन लोगो को बता दूँ, की चमत्कार और वास्तविकता में बहुत अंतर होता है,
गुरूघासीदास बाबा ने अपनी उर्जा शक्ति योग साधना की शक्ति के बारे में बताया था |
आज के लोग गुरुघासीदास बाबा के ज्ञान का पालन कम करते है, और दाढ़ी बढ़ाने में जायदा रूचि ले लेते है |
मगर गुरुघासीदास बाबा ने ऐसा नहीं कहाँ था, गुरुघासीदास बाबा पूरी तरह से रुढ़िवादी परंपरा के खिलाफ थे |
गुरुघासीदास बाबा ने 4 चीजो के बारे में बताया है जो जीवन में सबसे बड़ी भूमिका निभाते है, और इसे बदलने के लिए सन्देश दिया है |
बोलने में – अपनी वाणी को सुधारो |
कर्म – अपनी कर्म सुधारने पर जोर दिया है |
खानपान – अपना खाना पिता स्वच्छ शाकाहारी खाने पर जोर दिया है |
रहन सहन – गुरुघासीदास बाबा ने रहने का घर और तौर तरीका को मस्त सुधारने पर जोर दिया है |

गुरुघासीदास बाबा का सतनाम जैतखाम

जैतखाम अर्थात सत्य के विजय का खम्भा,
आपने भी सुना होगा, सत्य की विजय हो |
सत्य कभी मिट नहीं सकता, सत्य छुपता नहीं |
ये उसी सत्य का फताखा है, जिसकी पूजा की जाती है |
कई लोग कह देते है की, गुरुघासीदास बाबा ने मूर्ति पूजा को मना किया है, तो दूसरी तरफ लोग, मूर्ति के रूप में या तस्वीर में बाबा जी पूजा की जाती है |
गुरूघासीबाबा को किस प्रकार से माना जाता है यह जाने |
जैतखाम की पूजा नहीं होती है, जैतखाम के ऊपर लगे सफ़ेद चौकोर झंडे की पूजा होती है | जो सफ़ेद रंग का होता है, जैतखाम भी सफ़ेद रंग का होता है |
सतनाम को मानने वाले फोटो तस्वीर या मूर्ति की पूजा नहीं करते |
जो करते है, उनको ये ज्ञान नहीं होगा की जैतखाम के ऊपर लगे झंडे की पूजा की जाती है |
और जिस जैतखाम में झंडा नहीं लगा रहता उसकी पूजा नहीं की जाती,
इसलिए सभी जैतखाम में झंडा लगाना अनिवार्य होता है |
गुरुघासीदास बाबा को मानने वाले घंठी नहीं बजाते |
गुरुघासीदास बाबा की जयंती 18 दिसम्बर को मनाया जाता है |
छत्तीसगढ़ में गुरुघासीदास बाबा का सबसे बड़ा मेला फाल्गुन शुक्ल पक्ष के समय में तीन दिन का मनाया जाता है |

गुरुघासीदास बाबा कौन है ?

वास्तव में गुरुघासीदास सतनाम के प्रवर्तक है, सतनाम की परम्परा कई हजारो साल से चली आ रही है, जो वर्तमान में सतनामी है, ओ आज के जाति वाचक सतनामी नहीं है, हजारो वर्ष पहले जो भी लोग सतनाम के मार्ग में आगे बढे सत्य को मानते थे, मूर्ति पूजा और मांसाहारी कार्य नहीं करते थे, सत्य का आचरण करते थे, जो सत्य के मार्ग में चलते थे वही सतनामी कहलाते थे |
वास्तव में सतनामी कोई जाति का नाम नहीं है यह एक पन्त है,
कुछ लोग इस पंथ से भटक गए है, इसलिए गलत कार्यो मोह माया शराब मांसाहारी मूर्तिपूजा में चले जाते है |

213 इसवी में सतनामी राजा ने दिल्ली में 50 वर्षो तक देश में शासन किया था |
ये उस समय से सतनामी कहलाते आ रहे है, जब कही भी किसी धर्म की न जाति की उत्पत्ति हुई थी |
छत्तीसगढ़ में जितने भी लोग रहते है, उन्हें सतनामी के नाम से जाना जाता है,
छत्तीसगढ़ के लोग गुरुघासीदासबाबा के उपदेशो पर चलते है, यहाँ किसी प्रकार की जाति पाती, ऊँच नीच का भेद नहीं है, सभी हर प्रकार के सुख दुःख में मिलकर कार्य करते है, यहाँ आज तक कोई जाति गत या धार्मिक हिंसा नहीं हुई है |
यहाँ सभी मानव मानव एक समान का सन्देश देते है |

जो सतनाम को मानते है, उनमें कुछ खास गुण देखने को मिलता है |

सभी एक जुट होकर एक विशेष दिन जैतखाम के पास आते है, और सामूहिक पूजा करते है |
साथ में अपने साथ चावल या कुछ चंदा देते है, सामाजिक कार्यो के लिए |
समाज की बुराइयों को कैसे दूर किया जाये और पारिवारिक समस्या का समाधान समाज में ही करने का सन्देश देते है |
गुरुघासीदास जयंती के समय 18 दिसम्बर को घर के सामने रंगोली और दिए जलाते है |
उस दिन सतनाम को मानने वाले किसी प्रकार की मांसाहारी और नशाखोरी कार्य नहीं करते |
कही कही तो सतनाम सन्देश यात्रा और हर गाँव शहर में गुरुघासीदास बाबा के सन्देशो का प्रचार होता है |
सतनामी किसी के सामने झुकने को नहीं मानते , ये समानता को मानते है |
इसलिए सभी को सतनाम, और साहेब सतनाम कहते है |
इस दिन गुरुघासीदास बाबा की धयान भूमि और जन्म भूमि पर सतनाम का मेला लगता है |
गुरूघासीदास बाबा को सतनाम पुरुष के नाम भी जानते है |
अर्थात वह सत्य वह सतनाम को इस संसार का जगत का मालिक है |

गुरुघासीदास बाबा को ज्ञान की प्राप्ति कैसे हुई |

आपने मेडिटेशन का नाम सुना होगा, जिसमे दिमाग शांत और बहुत बुद्धिमान हो जाता है, इसी को ध्यान कहते है, इसी की एक अवस्था ज्ञान प्राप्ति की होती है, जिसमे जिस ज्ञान को और अपने में उर्जा आ जाती है |
गुरुघासीदास बाबा जंगल में खुले जगह में ध्यान में, लगे थे ,अगर गुरुघासीदास बाबा कोई साधारण मानव होते तो शेर उनको नहीं खा जाता |
बल्कि खुद शेर गुरुघासीदासबाबा की रक्षा करने के लिए पहरा देता था, की कोई इनको चोट न पहुचाए |

गुरूघासीदास बाबा के मृत्यु के सम्बन्ध में,

गुरुघासीदासबाबा जी के मृत्यु के सम्बंध में कोई प्रमाण नहीं मिलता, बाबा अंतर्ध्यान हो गए थे | इसलिए यह कभी नहीं कह सकते की बाबा जी का मृत्यु हो गया है

गुरुघासीदास बाबा की कहानी 

जब गुरुघासीदास बाबा 5 या 7 वर्ष के हुए तो, इनके पिता मंगुदास ने गुरुघासीदास को स्कूल में भर्ती करके के लिए, बहुत दूर स्कूल ले गए |
उस समय भेद भाव इतना बढ़ा चढ़ा हुआ था की, लोगो को भेद भाव किया जाता था, गुरूघासीदास बाबा को इन्ही भेदभाव का सामना करना पड़ा और वे स्कूल में नहीं पड़ पाए |
जब वे 7 वर्ष के थे तो, गुरुघासीदास बाबा ने अपने पिता मंहगूदास से कहाँ की अब मै खाली क्या करूँगा, गाँव के गाय बैल को चराने का काम करूँगा |
इस तरह से गाँव भर में डंका बज गया की अब से गुरुघासीदास गायो को चरायेगा |
पहले दिन गुरूघासीदास गायो को लेकर पास डोंगरी में ले गया, एक पेड़ के नीचे गुरुघासीदास बैठ गए, और गए चरने लगी |
गुरुघासीदास के मन में समाज के बारे से चिंता बहुत थी, की समाज इस तरह से क्यों है, सब एक समान क्यों नहीं है |
जब वे पेड़ के नीचे बैठे थे,
उनका ध्यान एकाग्र हो गया |
इस तरह से जब शाम को उनका ध्यान टुटा तो देखते है, की सभी जानवर एक झुण्ड में एक जगह बैठे |
इनको देखकर गुरुघासीदास बाबा समझ गए की, मानव भी इन्ही की तरह है,
मानव को भी एक झुण्ड में, संगठन में, रहना चाहिए |
दुसरे दिन पेड़ पर बैठकर गाय चरा रहे थे, तभी शेर आया |
तो घोड़े और जंगली गए भाग गए, और गाये झुण्ड में हो गए और बच्चों को बीच में रख लिए | उस दिन सीखे की समाज का नेतृत्व बुध्धिमान और ताकतवर करेंगे |
उसी दिन देखा की जब हांथी वही चर रहा था, तो उनको कोई प्रभाव नहीं पड़ा, इस बात से उनको बहुत प्रभाव पड़ा,
इस तरह से गुरुघासीदास बाबा ने अनेको शिक्षा तर्कबुध्धि से प्राप्त की |
अगर किसी को अनपढ कहकर आपमान करते हो, या अपने आप को पढ़ा लिखा मानते हो, तो इस ज्ञान को याद कर लेना |
अनपढ उसे कहते है, जो पढ़ लिख न पाया हो |
लेकिन नसमझ उसे कहते है, जो पढ़ लिख कर भी तर्क बुध्धि और शिक्षित न हो पाया हो |
गुरूघासीदास बाबा ने वास्तविक ज्ञान का सन्देश दिया है इसलिए बाबा बनने में न लगो |
किसी का अपमान न करो, पढो लिखो और तर्क पूर्ण शिक्षित बनो |
अगर कुछ समझ आया हो तो शेयर भी कर दो, आपसे प्रेम करेगा |
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