Sep 18, 2018

हिन्दू धर्म का क्या है? ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य शुद्र क्यों ? गुलामी से निकलो ST, SC,OBC, जरुर पढ़े |

हिन्दू धर्म का क्या है?  ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य शुद्र क्यों ? गुलामी से निकलो ST, SC,OBC, जरुर पढ़े |
क्या आप जानना चाहते है हिन्दू धर्म क्या है | तो पढ़िए पूरी जानकारी
सबसे पहले धर्म को जानते है उसके बाद हिन्दू धर्म को जानेगे,
पुराने नियम या प्रथा या किसी के द्वारा बताये गए सन्देश आगे चलकर वही धर्म, उसके पथ पर चलने वाले लोगो द्वारा धर्म बना दिया जाता है |
जैसे इसाई धर्म , मुश्लिम धर्म, सिख धर्म, बौध्द धर्म, जैन धर्म |
इस तरह से लेकिन हिन्दू धर्म सबसे प्राचीन धर्म है यह तो आपने सुना ही होगा,
लेकिन इसकी वास्तविकता को आप नहीं जानते होंगे
तो गौर से पढ़े बार बार पढ़े समझे तभी आपको समझ आएगा |
हिन्दू धर्म में चार प्रकार के वर्ण है जिसे चातुरवर्ण 4 वर्ण कहते है |
जिसमे ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, और शुद्र आते है
( यही चारो वर्ण हिन्दू धर्म में आधार शिला है )
आज भारत के सभी हिन्दू इन्ही चारो वर्णों में बंटे हुए है ,
ब्राम्हण के द्वारा हमेशा से यह भ्रम लोगो के मन में डाला गया है की वर्ण कर्म के आधार पर होते है |
( परन्तु यह सबसे बड़ी झूट है | जैसे स्वर्ग की बात )
एक देवता जिसका नाम ब्रम्हा,
जिसके संतान ब्राम्हण अपने आप को मानते आये है |
ब्राम्हण स्वंम कहते है
ब्रम्हा ने अपने मुख से ब्राम्हण को पैदा किया
अपने छाती से क्षत्रिय को
पेट से वैश्य को
और पैरो से शुद्र को
ब्राम्हण का कार्य नियम बनाना देवताओ की सेवा करना
क्षत्रिय का कार्य ब्राम्हण क्षत्रिय तथा वैश्य की रक्षा करना
वैश्य का कार्य शुद्रो के द्वारा उगाये गए अन्न को लाकर ब्राम्हणों क्षत्रियो को खाने के लिए देना तथा सामग्री वसूल करना |
और शुद्र का कार्य इन ब्राम्हणों क्षत्रिय और वैश्य की गुलामी और निश्वार्थ भाव से सेवा करना है |
मनुस्मृति में स्पस्ट लिखा है शुद्रो का धर्म सिर्फ सेवा है इनका अलग से कोई धर्म नहीं है |
हिन्दू धर्म आज भी इसी वर्ण व्यवस्था पर टिका हुआ है |
हिन्दू धर्म देवी देवता वाद, और कहानिवाद है |
ब्राम्हण अपने आप को इसलिए सबसे श्रेष्ट कहते है क्योकि देवी देवता के ये पुजारी और वंसज है |
हिन्दू धर्म की वर्ण पर आधारित है | और वर्ण का आधार देवी देवता है |
( वास्तव में हिन्दू नाम का कोई धर्म नहीं हो सकता, क्योकि यह वर्ण धर्म है )
( जो लोग देवी देवता की पूजा करते है वही हिन्दू धर्म के अंतर्गत आते है बांकी नहीं ) जैसे सतनाम प्रवर्तक, कबीर प्रवर्तक, क्योकि इनमे देवी देवता को नहीं पूजा जाता | सबसे जटिल धर्म हिन्दू धर्म है इसे समझना बहुत कठिन है क्योकि कोई भी स्पस्ट सटीक जवाब नहीं दे सकता और देगा भी तो कापी पुस्तक पोथी पुराण खोल के जो की ब्राम्हणों ने खुद से कपोलकल्पित लिखी हुई है |
हिन्दू धर्म के अनुसार जो शराब और मास खाता है वह वर्ण में गिना जाता है |
तो बताओ कितने ब्राम्हण आज अपने आप को शुद्र कहते है,
कोई इतिहास बताओ जिसमे कोई ब्राम्हण शुद्र बना हो |
क्योकि ब्राम्हण का बेटा ब्राम्हण कहलायेगा, और शुद्र का बच्चा शुद्र कहलायेगा यही हिन्दू धर्म की परंपरा है |
ब्राम्हणों ने देवी देवता को पूजना शुरू किया, उनको देखकर, क्षत्रिय, इन दोनों को देखकर वैश्य,
और अब बात करते है शुद्र की |
जब ब्राम्हणों को डर सताने लगा की शुद्रो की संख्या जादा है और ये कभी भी एक हो सकते है और हमारी सत्ता को चूर चूर कर सकते है तो इन ब्राम्हणों ने शुद्रो को जाति में बांटकर इनके इतने टुकड़े किये की आज भी ये इन टुकडो को गिन नहीं पाते |
शुद्र के तीन प्रकार है
सछुत – जिसे छुआ जा सके,
अछूत – जिसे न छुआ जा सके
और नीच जो सबसे नीचे माना गया है
शुद्र = सछुत OBC, अछूत sc, नीच st, इस तरह से |
ये आज शुद्र आज भी नहीं जानते की इन्हें शुद्र की श्रेणी में माना गया है |
हिन्दू धर्म की कहानी बहुत प्राचीन है आपको फिर से बता दू इसे समझना इतना आसन नहीं है |
कोई व्यक्ति जन्म से बुध्धिमान नहीं होता वह जन्म के बाद धीरे धीरे होता है |
इन लोगो को पूजा करते देख obc भी पूजा करना शुरू किये क्योकि ये इनके कार्य किया करते थे, लेकिन शुद्र ही थे |
इस तरह से आज भी obc पूजा करना शुरू किये
obc  को देखकर प्राचीन काल से sc पूजा करना शुरू किये
sc को देखकर st शुरू किया |
अब सुनो दंड गुलाम बनाने की प्रथा को |
सबसे ऊपर ब्राम्हण खुद बैठ गए | ब्राम्हण ने सबको अपने से नीचे गुलाम बनाया |
क्रम देखो गुलाम बनाकर राज करने का
ब्राम्हण- पंडित देवता का पुजारी मंदिर इसका दुकान
क्षत्रिय - डरवाकर राज करने वाले
वैश्य - तराजू वाले
शुद्र - मजबूर लोग गुलाम, दास,
 शुद्र अगर नियम का उलंघन करें तो उन्हें जैसा चाहो वैसा दंड दो |
जैसे अगर पैर से मारे स्वर्ण =( ब्राम्हण, क्षत्रिय,वैश्य ) को तो पैर काट दो
हाँथ से मारे तो हाँथ , आख दिखाए तो आँख
मुह से बोले तो जीभ थूके तो ओठ,
कान से कुछ मंत्र सुन दे तो कान काट कर सीसे को पिघलाकर डाल दो
नाक सिकोड़े तो नाक काट दो अगर सहन न हो तो सर काट दो |
इनके बहन बेटी नारी का खुले आम बलात्कार करो इस तरह का नियम |

इसी कारण से आज के लोग आदत से मजबूर है तथा पूर्वज के ज़माने से गुलामी की जिंदगी जीते आ रहे है | इनको डर दिखाओ इनको डराओ और राज करो |
किसका डर देवी देवताओ का डर भुत प्रेत का डर और किसका डर | नर्क का डर, अगले जन्म का डर, पाप योनि का डर,
आज देखो संविधान बन्ने के बाद ये लोग अपने बुध्धिजीवो लोगो को प्रवंचन करने के बहाने शुद्र को कथा माध्यम से लुटने तथा देवी देवताओ का गुलाम बनाने के लिए छोड़ दिये है , और खुद संसद और लोकसभा और बड़े बड़े पदों में जाकर बैठ गए है | और अपने अपने पोथी पुराण रामायण की कहानियो को शुद्रो के लिए छोड़ दिए है |
राम राम कहेंगे तो मोक्ष मिलेगा, कोई हनुमान जब रहा है, कोई गायत्री मंत्र
शुद्र आज बेशक गुलामी से आजाद हो चुके है थोड़े से,  लेकिन इन लोगो को नहीं पता है, की देवीदेवताओ की पूजा का अर्थ ब्राम्हाणवाद की गुलामी है |
कभी ये काली के नाम से, कभी शनि देव के नाम से ये डराते फिरते है |
और बारह राशियों के चक्कर में सबको दूरबुध्धि बनाये फिरते है |
और इनके पंडा पुजारी भीख मांगने के बहाने अपने ब्रम्हाणवाद के राज को जानने आते है | ये आलसी लोग है ये फ़ोकट के खाने वाले है, ये लुटने वाले लोग है |
तुम्हे गुलाम बनाने वाले लोग है |
कभी पूछ के देखो तो शनि क्या हिन्दू धर्म के लोगो के ऊपर होता है या अन्य धर्म के लोगो के ऊपर भी, या विदेशो में होता है , या भारत देश में ही होता है |
कभी पूछो तो सही शनि क्या होता है ? ये दुनिया भर के ढोंग तुम्हे डरवाने के लिए होता है |
ये संविधान बन्ने के बाद भी कहते है , शुद्र अगर मंदिर में आये तो इन्हें जूते से मारो | वास्तव में ये स्वर्ण ठीक कहते है क्योकि ये स्पस्ट जानते है की शुद्रो का देवी देवता नहीं है ये सवर्णों का है |
लेकिन आज भी शुद्र देवी देवताओ की पूजा करना नहीं छोड़े इनके उद्धार के लिए अनेको इनके संतो ने मार्ग बताया ये नहीं समझे क्योंकि |
ये आदत से मजबूर है |
ब्राम्हणों ने इनके दिमाग में आदत को भर दिया है ये आदत से मजबूर है |
ओ जैसा कहेंगे वैसा ही करेंगे |
आज ये मेरा देवता बड़ा, उसका देवता बड़ा, के नाम पर लड़ते है,
आज ये मेरी जाति बड़ी, उसकी छोटी, के नाम पर लड़ते है,
इसी तरह से आमिर गरीब, खान पान, रस्मो रिवाजो के नाम पर
ये दुरबुध्धि लोग लड़ते है |
ये सोचना नहीं चाहते, जब सोचेगे ही नहीं तो समझेंगे कैसे |
जब समझेंगे ही नहीं तो विचार कैसे करेंगे, और जब विचार ही नहीं करेंगे तो तर्क बुध्धि कैसे आएगा | और जब तर्क ही नहीं लगायेंगे तो, तह तक कैसे पहुचेंगे |
आज देखो शुद्र समाज एक होने की जगह लड़ रहे है, ये जानने की कोशिस ही नहीं करना चाहते की जाति क्या है ? धर्म क्या है ? मै गरीब क्यों हूँ
ये स्वर्ण ही आमिर क्यों है हमें नौकरी क्यों नहीं मिलती है |
ये नहीं जानना चाहते |
क्योकि ये दुरबुध्धि लोग है, अगर दूर से बुध्धि को आते देख ले तो कही छुप जायंगे | उस रास्ते से पलट जायंगे, भाग जायंगे, लेकिन कोई तर्क की बात करें तो उसे पागल कहेंगे | क्योकि पागल कहना आसन है | दूरबुध्धि लोग सोच नहीं सकते इसलिए पागल कह देते है, अगर पागल नहीं कहेंगे तो सोचना पड़ जायेगा की ये क्या कह रहे है |
जैसे ब्राम्हण नए नए देवी देवता के अविष्कार में लगे हुए है जो सबसे जायदा इन शुद्रो को हमारे करीब मोह जाल, किसी भी माध्यम से अपने पास ला सके |
और हम इनका शोषण कर सके इनको गुलाम बना सके, इनको लुट सके इनको गरीब बना सके, इन शुद्रो को बीमार बना सके |
जैसे देवी देवता के मूर्ति को कहाँ डालते है,
नदी, तालाब, नाला में, तो जो डालते है क्या वे उस किचण में नहाते है, नहीं
बल्कि शुद्र ही नहाते है |
अरे शहर के लोग गन्दगी करते है, तुम गाँव के लोगो को क्या हुआ आपको स्वछता तो बहुत प्रिय है | फिर क्यों करते हो ऐसा,
एक काम करो अपने गाँव को छोड़कर दुसरे गाँव में मूर्ति को डाल के बता दो |
मै मान जाऊंगा उस गाँव के लोग सच्चे मूर्ति पूजा के भक्त है |
जो डालते है उनके बच्चे बीमार नहीं पड़ते, जो नहाते है उनके बच्चे बीमार पड़ते है | ओ तो बड़े मौज से स्विमिंग पुल में, अपने घर में, नल में नहा लेते है |
तो फिर आप उनके कचड़ा करने कैसे दे देते हो |
गणेश देवता को देखो |
ये शुद्र दूरबुध्धि लोग सोचना ही नहीं चाहते |
गणेश मिटटी से बना |
गणेश के पिता ने अपने बच्चे का सर काट दिया |
अब जोड़ने के लिए जानवर हांथी के बच्चे का सर मिला |
उसी सर को नहीं जोड़ सकता था |
काट के शिव ने गणेश में जोड़ दिया |
जोड तो दिया लेकिन इन्सान और जानवर का सर कैसा जुड़ सकता है |
चलो मान भी लिया जुड़ गया लेकिन इतना बड़ा सर कैसा जुड़ा होगा छोटे से बच्चे में |
चलो ये भी मान लेते है लेकिन आदमी और जानवर का खून तो एक नहीं हो सकता इसे कैसे माने |
चलो ये भी मान लिया लेकिन आदमी और जानवर की पेशी और दिमाग, और नली कैसे जुड़ सकती है इसे कैसे माने |
चलो ये भी मान लिया लेकिन गणेश बोलता है कैसे मान ले |
चलो ये भी मान लिया, लेकिन इतना बड़ा भारी भरकम गणेश मुसक में बैठता था |
चलो ये भी मान लिया |
जो कहाँ ओ सब तो मान लिया और क्या बंकि है |
अब तो गणेश से डर नहीं लगता लोग समझदार हो चुके है |
बच्चे अघवा बनकर आज गणेश मनाने में खुश है |
कुछ  दूरबुध्धि लोग भी इनका साथ देते है, क्या करें ये गुलामी की आदत से मजबूर है |
साहब जहाँ देखो गणेश के आड़ में बच्चे फ़िल्मी गीत चला रहे है, रात में फिल्मे चल रही है | न पढने का इनको बहाना मिला है |
और पालक भी छुट दिए है, समय आया तो यही बच्चे कहेंगे, मै भी शंकर देव जैसे बड़ा डॉक्टर बनूगा, काटे हुए सर को जोड़ दूंगा |
पिता जी आप देख नहीं रहे है मै बड़ा डॉक्टर को देख रहा हूँ |
अरे दूरबुध्धि लोगो क्यों कर रहे हो ऐसा |
बच्चों को बेवकूफ बनाना है क्या ?
आज बाबा साहेब आंबेडकर न होते तो क्या होता पता है |
आज उनके तुम गाय बैल चरा रहे होते, दूध दुते लेकिन ओ पीते,
जानवर मरने के बाद तुम्हे खाल निकालने के लिए देते |
और जब चप्पल बनाते तो वे पहनते, और उन्ही चप्पल से तुम्हे मार के ये बताते की तुम शुद्र हो गुलाम हो मेरे तुम, तुम सेवक हो मेरे, तुम्हे सोचने का अधिकार नहीं है |
तुम आज भी उनके कपड़े धो रहे हो, आज उनके लिए घर बना रहे हो लेकिन बन्ने के बाद उसे शुद्ध किया जाता है |
तुम उनकी सेवा कर रहे हो लेकिन ओ तुम्हे नीच मानते है तुम्हारे घर खाना भी नहीं खाते |
तुम्हे दूर से देखकर ही घृणा मानते है |
और फिर भी तुम कुछ नहीं कहते |
बड़े प्यार से रामायण करवाते हो, अरे तुम खुद तो गुलाब बने हुए हो अपने बच्चों को, बुलाये हुए रिश्तेदारों को, अपने औरतो बेटियों को क्यों गुलाम बना रहे हो |
ढोल पशु शुद्र और नारी |
ये है ताडन के अधिकारी ||
और आखिर में कहते हो मोक्ष मिलता है, तुम्हे इस जन्म की चिंता नहीं अगले जन्म की है |
और पूछने पर क्या कहते हो आदत है, जबरदस्ती ब्राम्हण दान और पूजा करने के लिए तो नहीं कह रहा है |
जितना हो सके उतना कर रहे है, क्यों नहीं करोगे तुम्हारा धन आज जायदा हो गया है, लुटाते रहो |
अच्छा बताओ मंदिर में पुजारी क्यों होता है |
देवी देवताओ की सेवा के लिए,
ठीक है मान लिया तो बताओ, पुजारी दान किसके लिए लेता है मंदिर के लिए या अपने लिए, आज तक बताओ किसी मंदिर का धन किसी गरीब के लिए काम आया हो तो |
क्या देवी देवता भिखारी है या गरीब है जो उसे धन चढाते है |
अगर ये पुजारी पैसे लेते है तो वास्तव में स्वार्थी हुए |
स्वार्थी का कैसा पूजा, कैसा सेवा, ये तो ढोंग है |
जो सुने यह ज्ञान बार-बार
ओकर होय दुर्गुण नाशा,
दुःख ओकर सब मिटक जाए
ज्ञान बुध्धि पास आये
जो सुनाए यह ज्ञान प्रवचन
याद करें सब लोगन
यह ज्ञान के पाठ योगेन्द्र धिरहे सुनाए |
सब लोगन के दुःख ल दूर भगाए ||

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