Jul 5, 2018

तुलाराम निराला की कविता, यह मंदिर नहीं धंधा है, ब्राम्हणों का फंदा है

yah mandir nahi dhandha hai bramhano ka fanda hai
यह कविता भगवान और देवी देवता के ऊपर हो रहे सृंगार और चढ़ावा और मानव की हालत को बयाँ करता कटाक्ष है,
ऐ दोस्त जरा एक लाइन का उत्तर तो दे जाना,
मानव ने पत्थर पूजा मानव मानव को कब पहचान सका।
         यद्यपि इसकी छाया को पा रूप रंग भगवान न सका।
      मानव फुटपाथो पर सोते भगवान भवन के झूलो पर।         
 मानव सुत पत्थल चाट रहे नैवैद्य ऊपर थाली भर भर ।
     जा रही हजारों की लाशे बिन कफ़न के मुर्दा खानों में।
     श्रृंगार नहीं पूरा होता उनके रेशम के थानों में। ।
     पत्थर अन्बहाये जातें है दुर्भाग्य दुध घी जल से।
       भूखी भीखमांगीन का बच्चा दो बूँद पानी पी न पाये कल से। ।
       सोने चांदी के ढेरों पर जितने भगवान बनाये है।
     मानव मानव का खून चूसकर कंकाल समान बनाये है। ।
       यदि यही धर्म के है धुरीण तो लानत है इनको ठोकर।
      यदि यही धर्म के नेता तो धिक्कार रहा इनकी ईश्वर। ।
      इन पण्डो और पाखंडो की ईश्वर ही ठेकेदारी है। 
       तो सुन लो आज तुलाराम निराला कहता है यह डायन और हत्यारी है। ।
       इंसान उठो फेको पत्थर अब मानव का पूजन होगा।
        मानव के शवों के ऊपर निर्माण बिधान नहीं होगा। ।
      इंसान न होगा नालों में मठ मे पाषाण नहीं होगा।
      स्वर्ग नर्क के ठेके का सौदा अब नीलाम नहीं होगा। ।
     तुलाराम निराला पुकार रहा है इन मानव मानव के कानों में।
     अरे बढ़के आग लगा दो जवानों इन पत्थर के भगवानो में। ।
      हम भू पर स्वर्ग उतारेंगे अपने कुछ चंद इशारों से।
         फिर देखो कितना भारी बल है जय भीम के नारों में। ।
आज के समय में देवी देवता के नाम पर हर किसी को लुट सकते तो, क्योकि भारत के लोग बड़े मुर्ख और अन्धविसवासी होते है,
अगर आपको इस कविता की सच्चाई देखनी है तो किसी भी मंदिर में चले जाओ, सब में एक जैसा हालत है,
यही देखने को मिलेगा,
यह मंदिर नहीं धंधा है, ब्राम्हणों का धंधा है,
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