Jul 20, 2018

सरकार शिक्षा में गुणवत्ता खोजने का ढकोसला बंद करें

siksha vyawastha ki dhandhli ka bhanthfod
जब से सरकारने ओपन विश्वविद्यायालायो को प्राथमिकता दी है, मनो शिक्षा का व्यवसायीकरण हो रहा हो जिसका शिक्षा रूपी दुकान का एक ठेकेदार है जो दुकान चलाता है शिक्षा लेने वाला ग्राहक है,
जहाँ पैसे के बदले ग्राहक को अंकसूची प्रदान किया जाता है, या सीधे सीधे कहे की मुक्त विश्वविद्यायालायो से पैसे लेकर मार्कशीट बेचने वाला एक है |

                         इन दुकानों में अनेक प्रकार के कोर्स चलाये जाते है पैसे लेकर डिग्रीया बाटे जाते है, व्यक्ति घर में जाकर इम्तिहान से परीक्षा लिखता है, फिर दुकान में लाकर जमा कर देता है, भला ये भी कोई पढाई है, और ऐसे व्यक्ति से आज ये आशा करते है की देश के भविष्य बनाने वाले बच्चो का भविष्य सुरक्षित रहेगा, यह बिलकुल भ्रम है |
                     
                    शिक्षा ही रास्ता है नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक मूल्य का जड़ है | जिस देश में शिक्षा की जड़े खोखली होतीजाती है, इस देश का पतन निश्चित होता है, शिक्षा व्यवस्था का सुद्रिड न होना देश में अनेक प्रकार के अवय्वास्थाओ को जन्म देता है | उस देश में अराजकता बढती है | पाखंड बढ़ता है, रूढ़िवादिता पनपती है, जातिवाद समाप्त होने का नाम नहीं लेता, बेरोजगारी, भ्रस्टाचारी चोरी डकैती, लुट, बलात्कार, ये अमानवीय कृत्य बढ़ने लगते है,
                         
                            क्योकि ये सब हमारे नैतिक और शिक्षा के मूल्य के पतन का ही परिणाम है, परन्तु आप कहेंगे हम तो 21 वी सदी में है, जहाँ साक्षात्कार चरम सीमा पर है फिर भी आप पतन की बात क्यों करते हो, इसका उत्तर है साक्षारता दर जो कागज पर अंकित है वह केवल कागज के चार दीवारों में बंद है, यह कागजी आकड़ा मात्र | शिक्षा व्यवस्था इतनी सुद्रिण होती, पाठ्यक्रम अगर सही होता, शिक्षा अगर सबके लिए सुलभ होती,तो यह दिन कदापि न देखना पड़ता, आज हजारो लाखो बेरोजगार निराशा के शिकार हो गए है, वे निराशा के शिकार इसलिए भी नहीं हुए है की उनको नौकरी नहीं मिली |

                               उनके पास विकल्प नहीं है, जिसके सहारे वे सम्मानपूर्वक जिंदगी जी सके तथा सुरक्षा का अनुभव कर सके, प्रत्येक व्यक्ति शांति पूर्ण तरीके से जीवन जीना चाहता है परन्तु सरकार की योजनाए उनके लिए जी का काल बनती जा रही है, राष्ट की व्यौरा जिनके हाथो में है उनकी ही नैतिक चरित्र का पतन हो चूका है, स्वार्थ के चक्कर में वे रास्त हित को प्राथमिकता देना भूल गए है, बल्कि राजनीती में परिवार वाद का विकास हो रहा है,

                            राजनीति की बागडोर जिनके हांथो में है,वही शिक्षा की गुणवत्ता और उसके पैमाने का निर्माण करते है, भला उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है | भारत तथा राज्यों में जितने भी मुक्त विश्वद्यालय है, वे सब किसी नेता या मंत्री के ही है, जिनमे खुलकर शिक्षा का कारोबार करते है,
                        आपसे निवेदन है, उस एक विद्यार्थी को सम्मान कर रहे है, आपने उन बांकी से कुछ नहीं कहा जो फैल हो गए |
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