Jul 23, 2018

जातियता और देश, और छुआ छुत पर निबंध

www.inhindiindia.in jatiwad aur chhuachhut par nibandh
दोस्तों एक समय था जब मनुष्य जंगली एवं बर्बर या सभ्यता एवं संस्कृति का जमिनिकरण नहीं था | उस समय मनुष्य की सारी क्रियाये पशुओ के समकक्ष थी | नाख़ून ही उसके लिए सबसे बड़ा हथियार था शायद इसी लिए नाख़ून बड़ा करते थे | जिससे वे अनेक प्रकार के हिंसक कार्य करते थे | यह नाख़ून उनके बर्बरता की निशानी थी | परन्तु आज इक्कीसवी सदी जो की ज्ञान विज्ञानं के प्रसार का युग है इस युग में जंगली मनुष्य सभ्य हो गया है, आज भी नाख़ून बढ रहे है, यह बढता हुआ नाख़ून उसे स्मरण दिलाता है की तू आज सभ्य शिष्ट नहीं हुआ | उस नाख़ून का बढ़ना ही उसकी आदिम प्रकृति का घोतक है जब जंगली एवं हिंसक था, बुध्धि सुनी था | यह इस जंगली पण को ही व्यक्त करता है |

                   दोस्तों क्या यह एक सभ्य समाज की पहचान है की कल तक जो देश अन्य देशी को धर्म और मानवता का पाठ पढ़ता था आज वह इतना चरित हिन् और अमानवीयता से युक्त हो गया है की वह हबस की आग में अपना सुध बुध भी खो चूका है, आज देश के तमाम हिस्सों से बलात्कार के मामले सामने आते है और सबसे शर्मनाक बात तो यह है की पीडितो में तो छोटी-छोटी बच्चियाँ भी शामिल है, उन छोटी छोटी मासूम बच्चियों का क्या कसूर है किस बात की उन्हें सजाये दी जाती है |

                     और जातियता यह एक ऐसा व्यव्हार है जिसको करने के लिए कोई ठोस और आधार भुत कारण भी नहीं है यह मात्र अन्धानुकरण है परंपरागत व्यव्हार का जिस प्रकार कुत्तो के नस्ल में एक गुण होता है , की हर पीढ़ी में भौकना अवश्य जानती है, वे यह तर्क नहीं करते की, हम क्यों भौक रहे है, ये बस उनकी आदत है, कुछ उनके बिरादरी के कुछ अन्य कुत्ते भौकने लगे, ये स्वंम बिना सोचे समझे भौकने लगते है | अरें भई ! पहले जाकर वहां पता लगाओ की माजरा क्या है, आपके बिरादरी के कुत्ते क्यों घुम रहे है फिर अगर उत्तर मिल जाए तो निश्चित ही तुम भौक लो | किसी ने कह दिया की अमुक व्यक्ति से छूने ने पाप लगता है,

            तब आप साबित करके बताये की पाप लगने की प्रक्रिया किस प्रकार होती है, और क्यों पाप लगती है, कोई तर्कपूर्ण एवं संतुष्टीकरण कारण बताओ तत्पश्चात उसे न छुओ |


      यदि आप ये मानते हो की खास किसी वर्ग के व्यक्ति को छू लेने से या उनके संपर्क में रहने से पाप लगता है, हम अशुद्ध हो जाते है, तब तुम ख़ुद को भला कैसे बचाओगे -

जिस घर में तुम रहते हो उसे एक अछूत ने बनाया है,

तोड़ दो वह घर |

जिस भोजन को खाते हो यूज़ अछूत ने उगाया है,

खाना बंद कर दो |

जिस थाली को खाते हो उसे भी फेक दो,

उसे भी अछूत ने बनाया है |

जिसमें सोते हो वह भी किसी अछूत ने ही बनाया है,

तुम सोना क्यों बंद नहीं कर देते |


वह तमाम सुविधाए लेना बंद कर डॉ अपना घर, बर्तन, पलंग, खाट, सबकुछ तोड़-फोड़, के फेक दो और ख़ुद के मेहनत से नया घर बनाओ उसका सारा काम तुम ही करो | स्वंम साल भर इट बनाओ स्वंम उसे लेकर घर तक आओ, अछूतों से कुछ काम ही न लो, और उस घर में सजाने वाली सारी सामने ख़ुद ही बनाओ |


और आखरी बात तुम सास लेना बंद कर दो क्योकि यह सभी हवा अछूतों की श्वास है,

और वह सब कुछ वापस करो जो किसी अछूत से लिया है, और अगर जिन्दा रह पाओ तो करो जातिवाद और फिर करना छुआ छुत का भाव |
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