Jul 20, 2018

भारतीय संस्कृति पर टी.वी, सिनेमा जगत का प्रभाव पर निबंध

bhartiy sanskriti par tv ka prabhav
आज की बदलती दुनिया एवं आधुनिकीकरण के दौर में मानव जीवन के प्रत्येक पहलुओ को प्रभावित किया जा रहा है | प्रत्येक क्षेत्र में मनुष्य का जो संचित ज्ञान है उसकी अवधारणा में परिवर्तन हुआ है | कल तक समान में जिस मूल्य को स्वीकार किया था , उसका परिष्करण करके उन्होंने नए मूल्यों को जन्म दिया है , और ये आवश्यक नहीं की नए मूल्य भी शाश्वत रहेंगे, भविष्य में इनकी भी विश्वनीयता संदिग्ध है क्योकि ये मानसिक बदलाव का दौर है |

बदलाव एवं परिवर्तन के इस दौर में नई-नई संस्थाओ का जन्म हुआ है जो भिन्न-भिन्न प्रकार से मनुष्य को प्रभावित कर रहे है |

              इस संस्थाओ में एक संस्था मीडिया एवं चलचित्र भी है, दृश्य माध्यम का लोगो के आचार एवं विचार को परिवर्तन करने में बहुत बड़ी भूमिका है लोग केवल मनोरंजन के लिए ही फिल्मे देखते है, लेकिन इस दौरान उनका उस फिल्म के साथ तदातम हो जाता है और वे उनमे से अधिकांश बीजो को अपना भी लेते है |

    अगर लोगो के बदलते फैशन की बात करे तो फिल्म और चलचित्र का इसमें सबसे महत्वपूर्ण योगदान है | लोग फिल्म अभिनेता हेयर स्टाइल उनके कपडे आदि का अनुकरण करने लगे है, कब पुराने फिल्म आते थे उस समय युवाओ का हेयर स्टाइल तद्युगीन था, आज के फिल्मो में हेयर स्टाइल बड़े अनोखे है  जिनका लोगो द्वारा अपनाया जा रहा है, वेशभूषा तक तो यह बात सही है परन्तु जहाँ तक दक्षिण भारत का एक्सन फिल्मे है विक्षिप्त लोगो में बहुत प्रभाव पड़ा है, आय दिन देखते एवं सुनते है की अब लोगो की मौत भयानक तरीको से हो रही है, जिसे देखने वाले की रूह कांप उठे |

        दृश्य माध्यमो ने सकारात्मकता के साथ नकारात्मकता को भी जन्म दिया है , फैशन की जहाँ तक बात है, आजकल अंग प्रदर्शन का चलन आ गया है जिससे लोगो की उत्तेजकता को भी बल मिलता है | टी वी एवं सीरियलो में प्रेम का खुला चित्रण होने लगा है, जिसमे चुम्बन स्क्रीन तो आम हो गए है, और इसे घर परिवार में सभी देख रहे है, इसलिए आजकल कम उम्र में बच्चे सयाना होते जा रहे है, और अनेक प्रकार की मानसिकता उथल-पुथल शोर मचा रही है | चूकी: किशोरावस्था को मानसिक तनाव संघर्ष एवं तूफान का कल कहाँ गया है, और इस उम्र में उनकी उत्तेकता को पोषण मिल रहा है भला वे विचलित क्यों न हो |

        आज फिल्म जगत बोर्ड को चाहिये की प्रतिस्पर्धात्मकता को त्यागकर उच्च आदर्शो से युक्त फिल्म बनाये जिससे रास्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चरित का निर्माण हो ताकि भविष्य में सस्कृति पतन के खतरे से निप
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