Apr 26, 2017

धैर्य की आवश्यकता

dhairy ki aawasyakta

सुबह से लेकर दोपहर तक कंप्यूटर में काम करता रहा | ऊपर से काम भी ख़राब हो गया , काम करते वक्त दोपहर हो चूका था | भुख के मारे कलेजा भी सुख चूका था |
घर को चल पड़ा कुछ समय बाद, माँ आई, भुख के मारे गुस्सा आ रहा था; भुख के मारे दिमाग काम करने को मना कर रहा था |
ऐसा लग रहा था, अब मेरा मन मेरे वश में नहीं रहा| मै अपना आपा खोता जा रहा था’ लेकिन यह तो छोटी सी बात है | बात तो बड़ी है, बड़ी है, लेकिन परिस्तिथि छोटी है,  इससे भी बड़ी-बड़ी परिस्तिथि आती है | जो परिच्छा में पास होने के लिए, तैयार करने के लिए, चुनौती से लड़ने के लिए, अनेको उपाय करती है | उसका एक ही विषय होता है, कि तुम्हारी परिच्छा है, तुम पास हो जाओ |
अगर फ़ैल होते हो तो बार-बार मौका दूंगा, अंतिम समय तक मौका दूंगा | तभी तुम धैर्य के साथ मेरे साथ चल पाओगे |
हर किसी की जिंदगी में यह समय बार-बार आता है | जब धैर्य की आवश्यकता होती है, धैर्य क्या है, अंतिम सास तक हार न मानना धैर्य है |
अगर शरीर से धैर्य खो जाए, तो  मन से हार न मानना धैर्य है |
अगर कोई मन से हार जाए तो, तन से हार न मानना धैर्य है |
लेकिन धैर्य मन के विषय में जाना जाता है, क्योकि मन ही सब कुछ है |
मन के हारे हार, मन के जीते जीत |
भुख के मारे गला सुख चूका था, माँ ने खाना देने में देर कर दी, जी कर रहा था माँ को डाट दूँ | माँ को डाटने की बात, जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती |
अपनी आपा भाव न खोना, ही धैर्य की निशानी है | विषम परिश्तिथियो से लड़ने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है, लेकिन जो धैर्य को नहीं अपनाता, तब तक धैर्य भी उसका साथ छोड़ देता है |
अगर किसी कार्य को किया जाता है, तो धैर्य से ही किया जाता है |
मुझे गुस्सा इसलिए नहीं आ रहा था, की मैंने खाना नहीं खाया था, गुस्सा इसलिए आ रहा था, क्योकि मेरा कार्य बिगड़ गया था |
बिगड़ने का कारण चाहे जो भी, लेकिन मन में यह निर्णय लेना की, अगली बार यह गलती न हो |
अगर दुसरे की वजह से हो, तो एक चुनौती मान कर स्वीकार करना ही धैर्य है |
और मैंने यही किया, और फिर से जुट गया |

Previous Post
Next Post

post written by:

0 Comments: