Apr 18, 2017

मनोज्ञान- एक नई सोच 4

मनोज्ञान- एक नई सोच 4

धर्म – मनुष्य ने जब से जीवन जीना प्रारम्भ किया है, तब से वह किसी धर्म का हिस्सा रहा है | धर्म को समझने के लिए आपको हिन्दू धर्म का उदाहरण पेश कर रहा हूँ |
आपने इसी मनोज्ञान में जाना है, युग चार प्रकार के हुए है,
सतयुग, द्वापरयुग, त्रेता युग, और कलियुग, हम भगवान की किसी न किसी रूप में पूजा करते आये है, क्योकि भगवान ने हमें संकट से उबारकर हमारी सदैव रक्षा की है |
जब भश्मासुर ने शिव को भष्म करने का प्रयास किया तो, भगवान विष्णु ने भश्मासुर को भष्म करके संहार किया |
और जब महिषा सुर ने तीनो लोको में हाहाकार मचाया तो, माता दुर्गा ने महिषासुर का वध करके तीनो लोको को बचाया |
इस तरह से भगवान राम ने अत्याचारी, दुष्ट, पर स्त्री, पर नजर लगाने वाला रावण को मारा|
जब दुराचारी कंश का अत्याचार बढ़ गया, और उसने सभी को मरना सुरु कर दिया तो, भगवान शिव ने कृष्ण के रूप में जन्म लिया, और कंश का वध किया |
इस तरह से देवताओ ने हमारे जीवन की सदा रक्षा की है |
राम भगवान के जन्म पर राम जन्मोत्सव, कृष्ण के जन्म पर कृष्ण जन्मोत्सव,
महिषा सुर को मारने और हर साल लोगो के वरदान देने के लिए माता दुर्गा की इस्थापना की जाती है |
गणेश भगवान संसार में सबसे अधिक बुध्धि मान है, इस लिए गणेश चतुर्थी मनाई जाती है, गणेश भगवान आकर हमें भी कुछ बुध्धि प्रदान करे, हम यह आशा रखकर पूजा करते है |
और इसी भक्ति भाव को संस्कृति कहते है, किसी देवत्व में विश्वास करना, और पूजा करना ही संस्कृति है |
धर्म की उत्पत्ती कैसे हुई –
देवत्व को मानने वाले लोगो, ने आगे चलकर धर्म की स्थापना की |
लेकिन इतिहास गवाह है, हिन्दू धर्म की किसी ने स्थापना नहीं किया, यह युगों से चला आ रहा है |
कालान्तर में जाती व्यवस्था नहीं पाई जाती थी |
इसलिए मै जाती प्रथा को मानने से इंकार करता हूँ,
संत कबीर दास का समर्थन करते हुए कहना चाहता हूँ,
“ जाती पाती पूछे न कोई, हरी को भजे सो हरी का होई ”
भगवान ने कभी वरदान देने से पहले कभी किसी से नहीं पूछा की तुम किस जाती के हो, उसी अनुसार से तुम्हे फल दूंगा |
जो भगवान को भजता है, वह भगवान का हो जाता है, चाहे वह किसी धर्म जाती का क्यों न हो |
जाति आज कुछ सदी पहले कार्य के आधार पर, संस्कृति को मानने वाले लोगो के अनुसार जाती का जन्म किया गया है |
जाती कर्म के आधार पर बनाया गया था – इसलिए जो जैसा कर्म करेगा, वह वैसा जाती का होगा | कर्म बदलता रहता है, इसलिए जाति भी बदलते रहना चाहिए |
मै जाती को मानने से इंकार करता हूँ, और जाती को राजनीतिक, मानते हुए, इसे षडयंत्र मानता हूँ |
आपको यह बात इसलिए बता रहा हूँ, ताकि आप सत्यता को जाने, बिना सत्य को जाने मनोज्ञान को नहीं जाना जा सकता |
जो मनोज्ञान का ज्ञान लेगा, वह सत्य के अनुसार ही जीवन को समझेगा |
प्राकृति के नियमो को सत्य के आधार पर चुनेगा |
आपको यहाँ पर निष्पक्ष होकर अध्यन करना है |
जीवन जीने के तरीके को चार भागो में विभाजित किया जा सकता है |
सांस्कृतिक या धार्मिक,
वैज्ञानिक,
राजनीतिक,
प्राकृतिक,
धार्मिक- जो एक धर्म के अनुसार जीवन जीता है |
वैज्ञानिक – जो सत्य को परखकर, सत्यता के अनुसार, अपने समझ के अनुसार जीवन को जीता है |
राजनीतिक – जो राजनीति के अनुसार निर्णय लेता है |
प्राकृतिक – जो स्वाभाविक, तरीके से जीवन जीता है,
वास्तव में सभी व्यक्ति में यह चारो गुण विद्यमान होते है | और सभी इन चारो तरीको से जीवन को जीता है |
मै किसी धर्म को ख़राब नहीं मानता, खराबी धर्म की संस्कृति में है |
और संस्कृति को बनाने वाले हम है, इस लिए ख़राब हम हुए |
जो खराबी है, उसे हमें ही दूर करना होगा, हमें एहसास हुआ, बलि चढ़ाना अत्याचार है, और इस खराबी को हमने ही दूर किया |
मनोज्ञानी वही कहा जा सकता है, जो सत्यता को स्वीकार करता है |
क्या है, क्या हो रहा है, यह स्वीकार न करके,  जो यह कहे, क्या होना चाहिये, वही मनोज्ञानी है |
अगर नियम हमने बनाया है, और उस नियम में हमें खराबी नजर आती है, तो उस नियम को हमें ही दूर करना होगा |
मै मानता हूँ, की मनोज्ञान में यह धर्म और जाती नियम को मैंने आपके मन में विचाराधीन के लिए छोड़ दिया है |
लेकिन इसका समाधान अगले आने वाले मनोज्ञान भाग दो में किया जायेगा |
अगर आपका कोई प्रशन है, तो आप ईमेल कर सकते है | inhindiindia@gmail.com
अगला विचार जल्द ही

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