Apr 18, 2017

मनोज्ञान- एक नई सोच 3

ManoGyan-ek nai soch 3

महत्वपूर्ण ज्ञान – इंद्रिय के माध्यम से बुध्दि दिमाग तक बात को पहुचता है, तथा मन(आत्मा) इंद्रिय के माध्यम से बुध्दि दिमाग तक बात पहुचाता है |
यहाँ पर समझने वाली ज्ञान यह है, बुध्दि दिमाग मन का अनुसरण करते है, न की मन बुध्दि का |
इस अनुसार से बुध्दि (दिमाग) इंद्रिय सभी मन के हुए, और मन अर्थात आत्मा शरीर का स्वामी हुआ |
इस अनुसार से मन अर्थात आत्मा ही सब कुछ है, और बांकी सभी आत्मा के हुए |
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इस ज्ञान को समझना इतना सरल नहीं है, इसे समझने के लिए मानव की क्रिया को समझना बहुत जरुरी है, तथा मानव किन तत्वों से मिलकर बना है |
मानव पञ्च महाभूत, पृथ्वी, जल , अग्नि , वायु , तथा आकाश से मिलकर बना है |
ये पाँचों पञ्च महाभूत कहे गए. और इनके गुण इस प्रकार है |
आकाश में एक गुण=> शब्द
वायु में दो गुण => शब्द + स्पर्श
अग्नि में तीन गुण => शब्द + स्पर्श + रूप
जल में चार गुण => शब्द + स्पर्श + रूप + रस
पृथ्वी में पांच गुण => शब्द + स्पर्श + रूप + रस + गन्ध
अब आगे बढ़ते है और जानते है, कि व्यक्ति का जन्म कैसे होता है |
माँ और पिता के प्रेम से ही बच्चे का जन्म होता है, माँ अपने बच्चे को कोख (गर्भ) में 9 महीने तक रखती है, उसके बाद अपने बच्चे को जन्म देती है, जन्म के बाद बच्चे का धीरे-धीरे विकास होता है, छः माह तक दूध पीना और सोना, बच्चा जब कुछ महीने का होता है, तो लोगो को पहचानना शुरू कर देता है |
बच्चे अगर किसी को सबसे जायदा समझते है, तो वह माँ होती है,
माँ के बाद पिता और परिवार के सदस्य होते है, जिनसे बच्चा पूरी तरह अवगत होता है |
व्यक्ति के जीवन को चार भागो में विभाजित किया जा सकता है,
जैसे – बचपन, किशोरा, जवानी, बुढ़ापा, |
इसमें जन्म से लेकर 12 वर्ष की आयु को बचपन, 13 से लेकर 22 वर्ष तक किशोरा अवस्था,
तथा जवानी शरीर और मन में जब तक बल, और मन तंदरुस्त है, तब तक बांकी बुढ़ापा है|
जीवन के काल को तीन भागो में विभाजित किया गया है,
वर्तमान काल, भूतकाल , और भविष्य काल,
वर्तमान काल- वह होता है, जो वर्तमान में होता है, जो हो रहा होता है,
भुत काल- जो वर्तमान काल को प्राप्त करके गुजर गया है,
भविष्य काल- जो वर्तमान काल को प्राप्त करने वाला है,
इन तीनो कालो में वर्तमान काल सबसे बड़ा है, क्योकि जीवन को इसी कल में जीया जाता है | और वर्तमान से भूतकाल का जन्म होता है, और वर्तमान से भविष्य काल का जन्म होता है |
मनोज्ञान में इन सभी का पूरी तरह से ताल मेल है |
कर्म –
कर्म शब्द की व्युत्पत्ति ‘कृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है, ‘करना’ कार्य करना , व्यापार करना, अन्य कार्य करना | इस अनुसार से मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह सभी ‘कर्म’ के अंतर्गत आते है | जैसे- सोना, उठना, खाना, पीना, बैठना, सोचना, दानदेना, लड़ना, गीत सुनना, सभी कर्म के अंतर्गत आते है | इससे यह सिध्ध होता है, की मनुष्य जो कुछ भी कार्य करते है, वह सभी कर्म है | गीता में बतलाया गया है, मन (मनसा ) वाणी (वाचा) कर्म (कर्मणा ) तथा शरीर (कायिक)  से की गयी सभी प्रकार की क्रियाए कर्म ही है | हम जो कुछ भी करते है, वह सभी कर्म के अंतर्गत आते है |
कर्म के अंतर्गत तीन तत्व आते है – कर्ता, परिस्थिति और प्रेरणा |
कर्म को पूर्ण करने के लिए किसी व्यक्ति अर्थात कर्ता का होना आवश्यक है , कर्ता के लिए परिस्थिति का होना आवश्यक है | परिस्थिति के बाद कर्म का संपन्न करने के लिए, प्रेरणा की आवश्यकता होती है | इन तीनो के बिना कर्म का संपन्न होना संभव नहीं | कर्म करने के बाद फल भी मिलता है | अर्थात किये गए कर्म के अनुसार अच्छा या बुरा परिणाम भी भुगतना पड़ता है |
कर्म को समझकर व्यक्ति किसी बुरे कर्म को करने से पहले उसे सुधार भी सकता है | कर्म मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है, अर्थात कोई भी व्यक्ति अपने आप को कर्म करने से नहीं रोक सकता है | कर्म के परिणामो से उत्पन्न भोग का नाम ही जीवन है | दुःख सुख, भोग, क्लेश का सम्बन्ध कर्म और देहिवान से है |
देह नशवर है, और आत्मा अमर है | स्वभावतः आत्मा अमरत्व (ब्रम्हा, परमात्मा, ईश्वर और प्रजापति) की ओर उन्मुख है |
प्रत्येक व्यक्ति जिस प्रकार का कार्य करता है, उसे उसका तदनुसार फल अवश्य प्राप्त होता है|
व्यक्ति की मृत्यु उसके जीवन की एक सिडही मात्र है, उसके जीवन की समाप्ति नहीं है | आत्मा कर्म के अनुसार 84 (चौरासी)  लाख जीवनी में भटक कर पुनः शरीर धारण करेगा | और फिर से कर्म करेगा | जिस प्रकार बछड़ा हजारो गयो में से अपनी माँ को बिना चिन्हे पहचान लेता है, उसी तरह से पूर्व जन्म में किया हुआ, कर्म अगले जन्म में पहुच जाता है | कर्म को तीन भागो में बाँटा गया है |
1. कायिक 2. वाचिक और 3. मानसिक
‘ जीव मानसिक सुभाशुभ कर्मो का फल मन से, वाचिक का वाणी से, और शरीर का शरीर से भोगता है | कर्म सिध्दांत को लोकोक्ति की भाषा में इस प्रकार इस्पस्ट किया जा सकता है | “ जो जस करै सो, तस फल चाखा ”
“ बोया पेड़ बबुल का तो आम कहा से खाय ”
इसका अर्थ है, जो जैसा कर्म करेगा, उसे वैसा फल प्राप्त होगा | यदि आम का फल लगाया है, तो आम ही मिलेंगे, और बबूल का पेड़ लगाया है, बबूल ही प्राप्त होगा | ऐसा संभव नहीं की बबूल के पेड़ में आम का फल लगे |
हमें सदैव अच्छे कर्म करते रहना चहिए. ताकि फल भी अच्छा प्राप्त हो |
संसार के किसी कोने में बैठे हुए परमात्मा की किसी चित्र, विचित्र इच्छाओ पर निर्भर नहीं है, अपितु वह प्रकृति के नियमो पर आवलम्बित है |
जैसे- सूर्य का उगना, पानी का नीचे की ओर बहना “ मनुष्य किसी के हाथ का खिलौना नहीं है, वह अपने भाग्य का स्वम निर्माता है |”
स्वम के लिए जीना मोक्ष का मार्ग नहीं है | मानव मात्र के सुख के लिए कर्म करना हितकर है | यह पिछड़े हुए लोगो के उद्धार का आदर्श है |
अभी आपने कर्म को जाना और फल भी |
व्यक्ति जीवन को जैसा समझता है, वैसा ही जीवन को देखता है, और उसी अनुसार जीता है, यहाँ पर समझने वाली बात है, जीवन हमें वैसा ही दिखाई देता है, जैसा हम देखना चाहते है, जीवन वैसा है जैसा जीवन जीना चाहते है |
मै जीवन को वर्तमान के अनुसार से यह निर्णय पर पंहुचा हूँ, कि इस संसार को चलाने वाला कोई है, कोई है, वह देव ही हो सकता है, प्रकृति के अनुसार से जीवन नहीं चल सकता | मै मानता हूँ, की पुरे ब्रम्हाण्ड का विकास पदार्थ के सम्मिश्रण से बना है, लेकिन मैं यह भी स्वीकार करता हूँ, यह सत, रज, और तम हो सकते है |
वैज्ञानिक के अनुसार से यह तीन तत्व, इलेक्ट्रोन, प्रोटोन, और न्यूत्रान से बना और तीनो के माध्यम से पुरे संसार की उत्पत्ति हुई है, मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ |
 जिस तरह से लोग मानते है, पृथ्वी बनने में करोडो साल लगे इस सत्य को भी स्वीकार करता हूँ, और यह भी स्वीकार करता हूँ, यह देव नियम से हुआ है |
मुझे नहीं लगता, की यह संसार अपने आप चल सकता है, इतिहास गवाह है, जब-जब इस पृथ्वी पर कोई आंच आया है, तो भगवान ने आकर रक्षा की है |
जिस प्रकार से युगों का आगमन हुआ है, उस अनुसार से पृथ्वी ने अपना रूप बदला है, चाहे कोई भगवान को माने या न माने, तुम्हारे कह देने मात्र से सिध्ध नहीं हो जाता |
न मेरे कह देने से की ईश्वर है, अगर मै कहूँ, सपने में मेरे भगवान् आते है, तो कौन यकीन करेगा ? अगर में तुम्हे बतलाऊ की मुझे भगवान ने दर्शन दिए है, तो कौन यकिन करेगा |
इसी तरह से देव है, जिस प्रकार से आज तुम्हे यकीन नहीं हो रहा, कि हमारा भारत देश 70 साल पहले गुलाम था | तो कैसा यकीन हो जायेगा की, 4000, 6000, साल पहले कोई राम और कृष्ण रहा होगा |
मै भी कितना बुध्दू हूँ, क्यू बार-बार भूल जाता हूँ |
“ जैसन काया, वैसन बुध्धि ” और किसी को जबरन ज्ञान न सूझी |
मनोज्ञान को तब तक आप समझ नहीं सकते, जब तक मन ( आत्मा ) और परमात्मा में यकीन न हो जाए |
यह मनोविज्ञान नहीं है, यह मनोज्ञान है |
जिसमे मन के बारे में पढाई करेंगे | मन अर्थात आत्मा के बारे में जानेगे |
मन ही आत्मा है, तो आत्मा को किसने बनाया, अगर आत्मा भगवान की है, तो भगवान को भी हमें समझना आवश्यक है |
मै धर्म को किस प्रकार से देखता हूँ |
धर्म और संस्कृति दोनों एक ही है, अगर संस्कृति है, तो वह किसी धर्म का हिस्सा है, संस्कृति धर्म से उत्पन्न हुआ है |
अगर कोई किसी धर्म को मानता है, तो वह उस धर्म की संस्कृति को अवश्य मानेगा |
संस्कृति और धर्म क्या है,
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संस्कृति और धर्म की ओर

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