Apr 18, 2017

मनोज्ञान- एक नई सोच

ManoGyan-ek nai soch

जय श्री गणेशाय नमः
मनोज्ञान
सत्य की खोज करता, मनो अपने ज्ञान से आगे बढ़ता हुआ |
लेख़क का परिचय  -
मेरा नाम योगेन्द्र कुमार धिरहे है, मैंने 2016  में बी,ए, समाजशास्त्र, में पूर्ण किया |
मेरे मन में मनोविज्ञान को विस्तार से जानने की आस हमेशा लगी रहती है, आगे हो सके तो एम, ए, मनोविज्ञान विषय में करूँ |
निवेदन -
मैंने अपने अनुसार मनोज्ञान का परिचय टूटी-फूटी शब्दों में वर्णन किया है, गलती होने पर माफ़ करे, और ईमेल करके मुझे अवगत कराये |
आपसे निवेदन है, की अपने में स्व विवेक से ज्ञान के खजाने को भरे |
यह विचार मैंने अपने ज्ञान अनुसार से वर्णन किया है, आप अपने ज्ञान अनुसार से अध्ययन करें |
मनोविज्ञान से परिचय –
मनोज्ञान दो शब्दों से मिलकर बना है, मनो + ज्ञान |
यहाँ पर मनो का अर्थ अलग होता है, और ज्ञान का अर्थ अलग होता है |
तो आइये इनका विस्तार से परिचय कर लेते है;
मनो -
मनो का अर्थ होता है, मन तथा मनो का व्यक्ति या आदमी, तथा
जब यही मन एक व्यक्ति तक सिमित हो तो उसे मन कह सकते है |
और जब इसी मन को एक से अधिक व्यक्ति के मन के साथ जोड़ दिया जाए, तो उसे मनो कह सकते है |
इसलिए मनोज्ञान में एक व्यक्ति का विशेष अध्यन न करके मनो को अध्यन कर रहे है |
ज्ञान का अर्थ –
व्यक्ति में जो ज्ञान होता है, उसे ज्ञान कहते है, जो दिमाग में होता है |
आपको बता दू , मै कोई भगवान नहीं, न कोई विशेष व्यक्ति हूँ , इसलिए मै अपने आप को सब के समान मान कर हम की भावना से विचार का विस्तार कर रहा हूँ |
मेरे विचार – किसी चीज की वास्तविक सत्यता ही ज्ञान है |
मन –
हर व्यक्ति; जीव के शरीर में एक आत्मा निवास करती है, जिसका नाम ही मन है,
वास्तव में मन ही आत्मा है, चूकी आत्मा के बारे में अभी विस्तार से नहीं बताया जा रहा, इसके बारे में आने वाली पुस्तक में आत्मा के बारे में विस्तार से बताया जायेगा |
शरीर को जीवित होने के लिए आत्मा का होना आवश्यक है, जिस जीव में आत्मा नहीं वह निर्जीव है |
इसी तरह से वही व्यक्ति जीवित है, जिसके शरीर में आत्मा वास कर रहा है |
हम जो भी सोचते है, वह मन के माध्यम से सोचते है, और जो सोचते है, वह दिमाग में सुरक्षित हो जाता है, इसके लिए दिमाग को आदेश नहीं देना होता की, की मै जो सोच रहा हूँ, उसे सुरक्षित रख लेना | यह जो क्रिया है, स्वाभाविक है, और कभी-कभी इसे अवाभाविक बनाना होता है, जैसे- चारो ओर से अलग-अलग ध्वनि सुनाई दे रहा/रही  है, आपको सिर्फ, एक ऑर की आवाज को ही, सुनना है, बांकी तीन ओर की आवाज को नहीं सुनना है, क्या यह संभव है; हाँ यह संभव है, | आपने यहाँ पर अपने मन को स्वाभाविक से अस्वाभाविक बनाया है, सुनना कान का क्रिया है, वह चारो की आवाज को सुनेगा, लेकिन यह सिर्फ एक ओर की आवाज को सुना, क्योकि मन के माध्यम से दिमाग को आदेश दिया गया की; सिर्फ एक ओर की आवाज को सुनना है |
यह कैसे संभव हुआ इसके बारे में, आप और पढाई करेंगे |
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