Apr 12, 2017

मन की भटक –

Man ki bhatak

आज पढ़ते वक्त ऐसा लगा, मानो मेरा मन किसी और चीज को सोच रहा है; किसी की ख्यालो में गुम है | जब मैंने देखा की जहाँ से पढाई शुरू की थी, वहां से निकलकर आगे बढ़ गया हूँ | पर याद उतना ही आ रहा है , जितना ध्यान से पढाई किया था; अचानक याद आया की मै तो पढने में बैठा हूँ, ये किस बात को सोचने लग गया | जो याद याद भी नहीं आ रहा, शायद इसी को कहते है भटक जाना; मन की चंचलता ही इसका कारण है, पर इसका परिणाम तो इश्पस्ट दिख रहा है | मुझे मेरे मार्ग से कर्म से हटाने की कोशिश कर रहा, मुझे मेरे मार्ग से भटका रहा है | कुछ करने के लिए मन की एकाग्रता आवश्यकता होती है | इन्द्रियों के बाद अगर किसी चीज की बारी आती है, तो वह मन है, अगर मन ही वश में नहीं होगा तो, कार्य करने वाली इन्द्रियां तो अपनी मनमानी करेंगे ही | कार्य के मार्ग से भटका देंगे, मुझे आवश्यक है तो मन को वश में करने की, मन को वश में करने का अर्थ यह नहीं की मन में कुछ सोचना ही नहीं है, इसका अर्थ यह है, कि कर्म अर्थात कार्य छेत्र में लगाना है | अक्सर बार-बार ऐसा होता है,की मन कही और चला जाता है , उसे अपने कार्य की ऑर ध्यान नहीं रहता | ऐसा क्यों होता है, | कभी-कभी पढ़ते वक्त लगता है, की यह मेरे काम का नहीं, इसे मुझे नहीं पढना चाहिए; फिर क्या होना था | मैंने सोचा और मन आकाश में उड़ने लगा , लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए, मुझे तो कुछ और ही करना है, क्या करू कैसे इस मन को वश में करूँ |उपाय – वह सोचो जो वास्तव में सोचना चाहते हो, न की वह जिसे मन सोच रहा है |


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