Jan 9, 2019

10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण (सामान्य वर्ग) का राजनीतिक खेल: विकास बनाम राजनीतिक ध्रुवीकरण
aarakshan ka khel 2019

सामान्य (जनरल) जिसमें ईसाई, मुस्लिम, जाट, गुज्जर, पटेल, ब्राह्मण, सिंधी, बनिया, मारवाड़ी, राजपूत, कपूर, पारसी, जैन आदि अर्थात 50% आरक्षित के अलावा सभी आर्थिक कमजोर, सभी अनारक्षित वर्ग शामिल हैं।

इसमें केवल गरीब लोग न कि केवल एक धार्मिक व जातिगत लोग... लेकिन, लगातार मीडिया में सवर्ण-सवर्ण ढोल पिटवाया जा रहा है!

जिसका एकमात्र कारण है, वोट!, सियासतदार डर गए हैं, उनके वोट बैंक से, अब जबरन एजेंडा सेटिंग, के तहत, प्रोपेगेंडा फैलाने का काम, मीडिया ने फिर शुरू कर दिया। मतलब गरीबों से नहीं, मतलब सवर्णों से है।
लेकिन आजकल सारी राजनीति दो मिनट में एक्सपोज़ हो जाती है इसलिए तगड़ा होमवर्क कर लेना चाहिए।

क्योंकि भाजपा के कई मंत्री यहां तक कि जेटली भी संसद में कह चुके हैं कि सभी जाति वर्ग (sc st obc के बाहर) आएंगे तो ईसाई और मुस्लिम में, ये स्वर्ण शुद्र वाला कॉन्सेप्ट नहीं चलता भाई! किसे मूर्ख बना रहे हैं।

और आर्थिक आधार पर गरीब लोगों को 10% आरक्षण उनकी गरीबी के आधार पर दिया जा रहा है न कि जातिगत, हाँ! उन्हें मिलेगा जिनको पहले लाभ नहीं मिल रहा था।
मगर, नियत पे शक उसी समय हो जाती है, जब कोई बिल आनन फानन में लेकर आ जाएं, जैसा कि अक्सर होता गया है। इसका क्या मतलब है, भलाई नहीं है। सिर्फ चुनावी स्टंट?
चलिये अगर गरीबों की भलाई के लिए लाए हैं तो कम से कम उसका जातीय ध्रुवीकरण तो न करिये, लेकिन नहीं करेंगे, तो इस खिचड़ी का फायदा क्या!! बस इन सभी कूटनीतिक चालों में रायता न फैल जाए!

aarakshan ka khel 2019

राज्यवार नौकरियों में आरक्षण, लेकिन आजतक बैकलॉग भरे नहीं गए और ये महज कागजी रह गए। सरकारी नौकरी में ऐसा कहा जाता है महज 4 फीसद हिस्सेदारी है sc st का। TOI के अनुसार 93% निजी कॉरपोरेट मैनेजर में non st sc एम्प्लोयी हैं। 80% लोग राजस्थान में अपने जातिगत पेशे वाले काम को करने को मजबूर हैं।
आरक्षण! कागजों में तो है लेकिन असल में सच्चाई में वैसा कुछ है नहीं। महीन तरीके से आउटसोर्सिंग, निजी आदि तरीके से तोड़ दिया गया। एक्का दुक्का पोस्ट निकाल कर। बड़ी चालाकी से!

निजी सेक्टर में ज्यादा मौके हो सकते हैं। वहां भी रास्ते बंद हैं। अगर होता तो देश तरक्की की राह में होता, इस देश में जितनी सरकारें कंफ्यूज दिखती रहीं हैं उतना तो ब्रेकअप करने वाला कपल नहीं होता है।



अजब-गजब || 10% आरक्षण का जादुई खेल
- 95% भारतीय परिवारों की वार्षिक आय 8 लाख से कम है.
- 86.2% लोगों के पास 2 हेक्टेयर व 5 एकड़ से कम जमीन है.
- 20% जनसंख्या के पास रहने के लिए 45.99 sqm एरिया से कम है।

तो अब क्या कहें, मैं भी भारत, तू भी भारत! वो गरीब है, मैं गरीब हूँ, हम सब गरीब हैं, पूरा देश गरीब है!!

इस तरह से इस कोटे में प्रत्येक भारतीय के लिए मचलने के लिए योग्य पर्याय संघर्ष वाली जगह है।
"आर्थिक आधार पर" लेकिन!

अत: तमाम सबूतों और गवाहों के आधार पर, 90% सवर्ण वर्ग को 10% आरक्षित सीट के लिए जबरदस्त संघर्ष करना पड़ेगा।

52% अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27% में अफीम वाले लॉलीपॉप से सुला दिया गया, या कहें निपटा दिया गया।


नए बहस की शुरुआत... लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का... अनेक राजनीतिक बुद्धिजीवी वर्गों को लग रहा है, इसका राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाएगा। उल्टा वोट बैंक छिटकेगा। घमासान होने वाला है, सब दौड़ पड़ेंगे। 2019 तय कर देगा हाथ में क्या आया, 100/100 या नील बटे सन्नाटा!!
Credit: DB
aarakshan ka khel 2019


मेरे दोस्त प्रभानन्द का कहना सही है। फिर से जनता और इस देश की मीडिया असल जरूरी मुद्दों को भूलकर, आरक्षण पे चिल्लम चिल्ली करने लगेगी। ये एजेंडा सेटिंग चुनाव तक खूब चलेगा और असल नाकामियों को शिफ्ट कर दिया गया है। लेकिन ये राजनीति वाले भी समझ लें आज की जनता उनसे ज्यादा समझदार और पढ़ी लिखी है। लॉलीपॉप और कैडबरी का अंतर उसे अच्छे से पता है। हमारी खुद की और देश की असल समस्या से ध्यान भटका नहीं पाओगे।
aarakshan ka khel 2019
कथनी करनी में अंतर नजर आता है, जो सीटें खाली पड़ी हैं उन्हें क्यों नहीं भरा जा रहा है? क्या सीवर, सड़क, नालियों की सफाई करने वालों में भी सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा? या ये महज एक खट्टे अंगूर है?

©® Amit K.C. "आरम्भ"

Jan 4, 2019

अजब गजब है देश में, हिंदी की स्थिति... राजधानी के केंद्रीय विश्वविद्यालय
jamiya milliya university जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी

अब इसे मौका कहें या मायूसी! अजब गजब है देश में, हिंदी की स्थिति... नई दिल्ली एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में मार्च के महीने में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी है। शोध संक्षेपिका भेजने की आखरी तारीख 31 दिसम्बर तय था। आनन फानन में 12 बजे रात्रि के लगभग जब पूरा देश नववर्ष के जश्न में डूबा था, मेरा शोधार्थी मन एब्स्ट्रैक्ट (शोध आलेख) लिख रहा था।
प्रातः मन में आशंका थी क्या! वो लोग आलेख स्वीकार करेंगे?
मैंने फोन घुमाया, एक महोदया ने फोन उठाया, इधर उधर की बातों के बीच अंत में मैंने कहा, महोदया मैंने अपना आलेख हिंदी में भेजा है। वो स्तब्ध हो गईं शायद, चुप्पी से आभाष हुआ।
उन्होंने बड़ी मासूमियत से खेद व्यक्त करते हुए कहा, अमित जी! हमारे यहां हिंदी पियर रिव्यु करने वाले पर्सन नहीं है। इसलिए हम केवल अंग्रेजी को शामिल किए हैं। मैंने अपनी भाषयी सामर्थ्यता बतलाई उन्होंने भी मजबूरी गिनाई कि हिंदी की बड़ी मजबूरी है, यहां भाषा परिषद में भी इसे शामिल करना बड़ा जंग है।
एक पल के लिए सोचा! अभी तक हम छत्तीसगढ़ी के लिए कोहराम मचाये हुए हैं, यहां तो हिंदी ही बीचक रही है। भारत में ब्रिटेन बसा है, एक पल ऐसा लगा।
मैंने ज्यादा इधर उधर किये उनकी सारी बात मान ली। उन्होंने भी मलहम भरे शब्दों में कहा, आप कैसे भी अंग्रेजी में बना लीजिए, भले ही हिंदी में प्रस्तुत कर दीजिएगा।
और हमारा जो टॉपिक है वह बहुत यूनिक है, हिंदी तो हिंदी इसमें अंग्रेजी में भी कायदे से ठीक काम नहीं हुआ है। थोड़ा बहुत फिल्मों में बस जिक्र हुआ है।
उन्होंने कहा, आगे हम कोशिश करेंगे, मैंने भी कहा, मैं भी करके देखता हूँ। शुक्रिया इतना लंबा बहाना, और मलहम लगाने के लिए।
जानते हैं उनका यूनिक टॉपिक क्या है! "कास्ट एंड कम्युनिकेशन"
जब हिंदी ही छुआछूत जैसी परिस्थितियों का शिकार हो जाए
और संचार के लिए भाषायी सीमा रेखा खींच दी जाए तो क्या ख़ाक! संचार होगा! सबसे बड़ी बाधा तो इन्होंने ही पैदा कर रखी है या तो इस देश में हिंदी के अच्छे जानकार शोधार्थी नहीं हैं?
मैं सोचता रहा, इसी देश में, इस देश की भाषा, दलित पीड़ित, पिछड़ी, शोषित हुई जा रही है।
सभी भाषा जरूरी है लेकिन कुछ इतनी जद्दोजहद में उलझ चुकी है कि वो निकल नहीं पा रही है। देशज भाषाओं का हाल, बुरा है।
शायद! अंग्रेजी की नगरिया, विकास की डहरिया... दिखा दे!!
"नेताजी का जादुई कुंठा" -अमित आरम्भ "छत्तीसगढ़िया"
neta ji ka jadui kuntha "नेताजी का जादुई कुंठा" -अमित आरम्भ "छत्तीसगढ़िया"

"नेताजी का जादुई कुंठा" 

एक पते की बात कहें, जब-जब बाजय घण्टा।
नेताजी सब काम को भूले, तब-तब जागे कुंठा।।

कुंठा ऐसी, प्रेम प्यारी, निस दिन, हृदय समाई।
रहय सदा, चिपकन ठिपकन, जैसे बेशर्म घर जमाई।।

किसी की कुंठा मंत्री जैसी, किसी की जैसे सीएम।
टूटे खाट पर चीख के बोले, जैसे 56 इंची पीएम।।

सुआ नृत्य में, गरबा वाली, राउत नाचा में डांडिया।
उसकी संस्कृति उज्वल थाली, अपना बासी, पेज का हंड़िया।।

अपनी भाषा सौतेली वाली, उसकी भाषा प्यारी।
अपना नेता गंवार अनाड़ी, परदेसिया गजब खिलाड़ी।।

महल टिकाके अब भी चिढ़े, जात न मन का मैल।
सारा हक है मार के बैठे,  सिंग नुकीले बैल।।

कुंठा कुंठा धूनी रमाये, बन बैठा मंत्री संतरी।
जाति अभिमान में भूल बैठे, समझ रहे खुद को क्षत्री।।

जैसे कुर्सी पर जमाया पैर, जागा भीतर का कुंठा।
दे दनादन आंच तपाकर, बजा दिया सबका घण्टा।।

कुंठा ऐसी मित्रों वाली, पद, पैसा, पावर वाली।
नीति नियम जब ताक में होंगे, फिर होत घमंड घर खाली।।

जात, पात, अभिमान की कुंठा, प्रतिशोध, अभिमान को माफ करो।
क्या रखा है ऐसी कुंठा में,  ऐसी कुंठा को साफ करो।।

आज करो जी, आज करो, ऐसी कुंठा को साफ करो।।
मिलजुलकर इस धरती पर, एक नवजीवन का निर्माण करो।।

- © Amit K.C.

Dec 28, 2018

सतनामी समाज को एक कैसे करें |

सतनामी समाज को एक कैसे करें |

satnami samaj ek kaise hoga.jpg

मैंने पिछले लेख के माध्यम से बताया था, की इस संसार में तीन विचारधारा के व्यक्ति रहते है,

1. एक जो ज्ञान वादी होता है, जो गुरुघासीदास बाबा को संत के रूप में देखते है, जो ज्ञान को स्वीकार करते है, योग साधना में विश्वास करते है |

2. और दूसरा जो आत्मा वादी होते है, जो गुरुघासीदास बाबा को परमात्मा, अर्थात सभी जीवो के आत्मा का मालिक इस संसार का मालिक के रूप में देखते है, जो भूत में विश्वास करते है |

3. और तीसरा जो असमझ में पड़ा रहा है, अपनी विचारधारा के अनुसार जीवन को जीता है |

अगर आप सभी सतनामी समाज को एक मंच में देखना चाहते है, तो सबसे पहले आपको अपने आप को स्वंम को, समाज के प्रति एक भावना, लोगो के प्रति एक भावना जगाना, की मुझे समाज को एक मंच में देखना है, कोई कुछ भी करें, समाज को एक करने के लिए, मै अपना योगदान दूँगा |

मै समाज को एक करने में अपना योगदान दूँगा |

अगर कोई गुरुघासीदास बाबा को साधारण व्यक्ति माने तो भी मै उससे किसी प्रकार का विवाद नहीं करूँगा, उनसे अपील करूँगा, हमें एक मंच में खड़ा होना है |

अगर कोई कहे, दिया जलाना गलत है, तो मै विवाद नहीं करूँगा, बस इतना कहूँगा, हमें प्रेम से आदर भाव से एक मंच में खड़ा होना है |

मै कुछ भी ऐसा कार्य नहीं करूँगा, जिससे समाज की एकता भंग हो |

सभी लोगो का एक ही लक्ष्य हो, हमें एक होकर कार्य करना है |

आज के समय में सभी धर्म के नाम पर आपस में लड़ रहे है, आपको धर्म के नाम पर लड़ाई नहीं करनी है, किसी दुसरे धर्म की बुराई करने से अच्छा अपने धर्म की, गुरुघासीदास बाबा के विचारो का गुणगान करें |

कृपया नीचे WhatsApp में जरुर भेजव

Dec 27, 2018

दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह का फेवरेट हनीमून डेस्टिनेशन?
दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह का फेवरेट हनीमून डेस्टिनेशन

बॉलीवुड सनसनी जवां दिलों की धड़कन दीपिका ने आखिरकार इटली में बॉलीवुड स्टार रणवीर सिंह से शादी रचा लिया है। रणवीर महिलाओं व युथ आइकन के रूप में माने जाते हैं। उनका कसरती बदन और कैरेक्टर में डूबकर निकलने वाले एक्टिंग ने सभी को ख़ासा प्रभावित किया है।

इससे पहले कई टीवी इंटरव्यू में रणवीर अपने इंटिमेट अफेयर के बारे में खुलकर बात करते देखे गए हैं। और कई ऐक्ट्रेस के साथ उनके लिंकअप की बातें भी खूब सुर्खियां बटोरी है।

बात करें दीपिका की तो उनके नाम को कई लोगों के साथ जोड़ा गया और उन्हें कई बार डेट और बाहर स्पॉट किया गया है।

इटली में शादी की फोटो

आखिरकार तमाम अटकलों पर ब्रेक लगाते हुए दोनों जोड़ी ने शादी के बंधन में बंधने का फैसला किया। इससे पहले दोनों कई फिल्मों में साथ नजर आ चुके हैं। कई हिट फिल्में उनके नाम हैं। उनकी जोड़ी बेस्ट पॉपुलर जोड़ी ऑनस्क्रीन व ऑफस्क्रीन मानी जाती है।

शादी के लिए उन्होंने भी इटली को चुना और सिंधी रीति रिवाज से दोनों की शादी पूरे परिवार के साथ सम्पन्न हुआ। सबसे ज्यादा दिलचस्पी लोग उनकी हनीमून प्लानिंग को लेकर लोग कयास लगा रहे हैं। ये दोनों जोड़ा आखिर कहाँ अपनी प्लानिंग जमा रहे हैं।

फिनलैंड हनीमून प्लेस की


लोगों में इतनी बेताबी है कि सोशल मीडिया में इस बात को लेकर कई तरह के मिम्स चल रहे हैं। जिसमें कुछ निजी ट्रावेल कम्पनियों से बात करते दिखाया जा रहा है।

मजेदार बात ये है कि आखिर लोगों ने इस खबर को कैसे लिक कर लिया कि ये दोनों भी विराट और अनुष्का की तरह फिनलैंड में अपना हनीमून प्लान कर रहे हैं।

ये खबर पहले बहुत गुप्त रखा गया था लेकिन मीडिया में ये बात उड़ गई कि वे दोनों फिनलैंड की झील का मजा लेंगे।
जहां शानदार नेचरल रिसॉर्ट में वो अपनी यादगार शाम गुजारने वाले हैं।

आजकल बिजनेसमैन, बॉलीवुड स्टार हो या क्रिकेटर शादी के लिए इटली और हनीमून के लिए कोई प्राकृतिक बर्फीली वादियां जो कहीं दूर देश में हो ऐसी जगह पहली पसंद बनी हुई है।

पहले के समय में दार्जिलिंग या स्विट्जरलैंड को बहुत पसंद किया जाता था लेकिन समय के साथ ट्रावेल, वीकेंड या कहें कि हनीमून डेस्टिनेशन बीच या झील के किनारे ज्यादा पसंद किया जा रहा है।

खैर आने वाला समय बताएगा कि प्रियंका निक, विराट अनुष्का, अम्बानी परिवार की लाडली और दिलफेंक आशिक रणवीर और दीपिका को कौन सी जगह सबसे ज्यादा मनमाफिक लगी।

-Amit K.C.

#दीपिका #रणवीर #शादी #हनीमून #इटली #फिनलैंड #विराट #अनुष्का #प्रियंका #बॉलीवुड #स्टार #फ़िल्म

Dec 24, 2018

इंडिया चाइना फ़िल्म फेस्टिवल दिल्ली में चला बंगाली फ़िल्म "माछेर झोल" का जादू: फ़िल्म रिव्यू अमित की कलम से
Maache Jhol

बंगाली फिल्मों के मामले में ये मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है. फ़िल्म के बैकग्राउंड म्यूजिक दिल को छू जाता है। एक राहत, सुकुन देने वाला है। इंडो चीन फ़िल्म फेस्टिवल में देखने का मौका लगा था. अंग्रेजी बतियाने वाले बंगाली दर्शक अधिक थे. ऑडिटोरियम हाल में राष्ट्रगीत के स्क्रीन नेम के साथ राष्ट्रगान चला दिया गया.

फ़िल्म पेरिस के एक रेस्टूरेंट से स्टार्ट होता है. एक बंगाली सेफ अपने स्टाफ को अपनी ओर हिप्नोटिज्म कर रखा है, क्योंकि वह गजब का खानसामा है. ग्राहक उसके दीवाने हैं, वहां उसकी एक गर्लफ्रैंड है जो दिलजान से उससे प्यार करती है. देव D नायक, उसके जन्मदिन पर नायिका सिमोन उसे शादी के लिए प्रपोज करती है एक केक में एक रिंग देती है, लेकिन देव न उस रिश्ते के लिए तैयार हो पाता है न इंकार कर पाता है. देव ऐसी कश्मकश में है जो उसे खुद नहीं पता.

Film Frestival indo chaina

रात को, अचानक देव को इंडिया से फोन आता है कि उसकी मां बहुत बीमार है. देव को अपनी मां से बहुत प्यार हैै, वो फिक्रमंद हो जाता है. वो सोचता है कि आखिर 13 साल से क्यों वो अपनी मां से दूर है?

आननफानन में अपनी गर्लफ्रैंड से विदा और वादा करके के वो वापस जरूर आएगा, इंडिया कलकत्ता के लिए उड़ान भरता है।
रास्ते में घर जाने के लिए टैक्सी लेता है, लेकिन वो खराब हो जाती है। कुछ लोग गुजरते हुए देव को देखकर उसे पहचान लेते हैं कि ये तो वर्ल्ड के टॉप फ्रेंच सेफ हैं. सब सेल्फी खिंचाने लगते हैं.
जब देव घर पहुंचता है अपनी मौसी के साथ तो उसके पिता बहुत रूखा व्यवहार करते हैं इसलिए देव एक होटल में चला जाता है.
जब डॉक्टर से अपनी मां के बारे में पता चलता है कि उसे ब्रेन ट्यूमर है तो वो बेचैन हो जाता है.
फिर देव के पिता फैसला करते हैं कि वो ऑपरेशन नहीं करवाएंगे क्योंकि इससे उनकी पत्नी के जान को खतरा है. लेकिन देव ऑपरेशन चाहते हैं ताकि उसकी मां हमेशा के लिए ठीक हो जाये. बाप बेटे में 13 साल से नाराजगी है.
फ्लेशबैक में स्टोरी चलती है जब वो पत्नी को बिना कारण बताए छोड़कर चला जाता है, वही लड़की उसे अचानक हॉस्पिटल में दिख जाती है, देव अचंभित हो जाता है. और पुरानी बातों को सोचकर दुखी होता है.

देव फैसला नहीं कर पा रहा है कि वो क्या करे इस बीच वो राय लेने उसकी पूर्व पत्नी जिसे उसने तलाक नहीं दिया है उसके पास राय लेने जाता है, वहां उसे एक बच्चा दिखता है. उस लड़की ने देव से कहा कि ये फैसला ऑपरेशन का, बेटा या पति क्यों ले रहा है? जिसे ऑपरेशन करवाना है उससे पूछो!

उसकी माँ ऑपरेशन के लिए मान तो जाती है लेकिन मच्छी झोर वही जो 14 साल की उम्र में देव ने बनाया था वैसा लजीज खाने का अनुरोध करती है. डॉक्टर से बात कर देव मान जाता है.

जिस होटल में देव ठहरा है वो बेस्ट होटल है. मच्छी झोर बनाने की बात से सब चौंक जाते हैं. मैनेजर को बोलकर सारे कुक को वो बुलाता है और एक कॉम्पिटिशन करवाता है. उसमें से एक बेस्ट कुक को वो अपने साथ रख लेता है ताकि वो अपनी माँ के लिए जायकेदार मच्छी झोर बना सके.

इस बीच उस महिला कूक को देव से प्यार हो जाता है. देव को जवाब नहीं दे पाता है. रोज वो अपनी मां के लिए रेसिपी बनाकर ले जाता है मगर उसकी माँ पसन्द नहीं करती और बार बार रोज देव को अपनी माँ को खुश करने के लिए मच्छी झोर बनाना पड़ता है.

इस बीच पिता से तकरार, बड़ी नौकरी व कूक क्यों बन रहे हो लेकर.. देव अपनी पूर्व पत्नी से पूछता है कि बच्चा उसका है, क्या उसका कोई हक नहीं. हैं न! एक स्पर्म डोनेट करने जितना ही एक भगोड़े बाप का।

अब देखना है कि क्या वो इन तीनों में किसके साथ जाता है? बाप बेटा साथ आते हैं? उसकी माँ के लिए लजीज मच्छी झोर बना पाता है या नहीं?
इसके लिए आपको फ़िल्म देखनी पड़ेगी!
बेहतरीन एक्टिंग, डायरेक्शन, कमाल की सिनेमेटोग्राफी, शानदार म्यूजिक...
शाकाहारी दर्शक हूँ पर फ़िल्म दिल को छू गयी.
और हां! बंगाली भाषा के कई शब्द छत्तीसगढ़ि से मिलते हैं, तो अपनापन लगा... जैसे झोर, खाबे, बस्बे, फिरबे, जाबे
तो आप फ़िल्म देखने कब जाबे?

Amit K. C.

Dec 22, 2018

प्रेम विवाह कैसे करते है ? भागकर शादी कैसे करते है ?
bhagkar shadi kaise karte hai love marriage kaise karte hai prem vivah kaise karte hai

एक समय था, जब लड़का और लड़की की जगर पीने, फांसी लगाने की, आत्महत्या करने की बाते और घटनाएँ रोज आस पास में सुनाई देती थी |
क्योकि उस समय लोग जागरूक नहीं हुआ करते थे, लेकिन आज जान समझ गए है, प्रेम करने वालो को जुदा कर पाना नमुनकिन है |

कानून के अनुसार शादी के लिए भारत में लड़के की उम्र 21 वर्ष तो लड़की की उम्र 18 होनी चाहिए |

ये जाति, ये धर्म, ये रंग का भेद, यह सभी प्रेम को तोड़ने के लिए बनाया गया है,

धन्य है ओ प्रेम करने वाले जो जीवन की वास्तविकता को स्वीकार करके एक दूजे में अपनापन को देख लेते है |
और कुछ प्रेम को तोड़ने वाले होते है, जो प्रेम करने से रोकते है |

आत्महत्या बनाम प्रेम विवाह

उस समय की नासमझी मज़बूरी थी, जो अनजाने में आत्महत्या कर लिया करते थे, आज कोई मज़बूरी नहीं है |
इसलिए प्रेम विवाह ही सबसे उत्तम विवाह है |

अगर कोई किसी से प्रेम विवाह अर्थात भागकर विवाह करना चाहता है, तो उसके नियम इस तरह से है |

लड़का और लड़की बालिक होना होता है |

लड़का का 21 वर्ष पूरा होना चाहिए |
और, लड़की का उम्र 18 वर्ष पूरा होना चाहिये |

अगर उम्र पूरा नहीं है तो उसका भी उपाय है |

कानून के अनुसार आप गुप्त तरीके से कलेक्टर आफिस में अर्जी दे सकते है |

या बहुत सारे ऐसे संस्था होते है, प्रेम विवाह कराते है, उनसे संपर्क करें |

अगर इतना भी समय न हो तो इतनी दूर चले जाए, जहाँ से लड़की और लड़के को लाना मुश्किल हो, दुसरे राज्य |
एक दुसरे के साथ मिलकर रहे, पैसे को फ़ालतू 1 रुपया भी खर्चा न करें |

भागने से पहले अपना गुरु किसी को बनाये जिससे आप मुशीबत में पैसे और सलाह मांग सके, और उनसे पूरा जानकारी ले |

घर वाले खोजेंगे ही, उनकी परवाह न करें, बस इतना ध्यान रखे, ऐसे जगह में रहे जहाँ, लड़की और लड़के को रहने में कोई समस्या न हो, जैसे छेड़खानी, शराबीलोग के पास |

अगर लड़का बालिक है, और लड़की 18 से कम है, और दोनों भागते है तो, पकड़ाने पर पुलिस केश भी हो सकता है |

अगर लड़की और लड़का दोनों नबालिक है, और भागते है, तो कोई केश नहीं बनता |

एक बात ध्यान रखे, भागने के बाद लड़की और लड़के का एक जुबान हो, हम एक दुसरे के साथ शादी करना चाहते है, जियेंगे साथ-साथ, अगर हमें जुदा किये तो, जो भी होगा उसके जिम्मेदार आप होंगे |

इतना जानकारी काफी है इसे फॉलो करें |

Dec 21, 2018

सतनाम धर्म, सतनाम पंथ, सतनामी उत्थान में बाधक है, सरनेम और उपनाम लिखना : योगेन्द्र कुमार
satanm dharm sanami utthan satnami samaj me badhak hai sarnem #Yogendra Kumar.jpg

सच बात कितनी कड़वी होती है, और इससे भी अधिक कड़वी होती है, सत्य को स्वीकार करना |
एक समय था, जब धूर्त मनु ने लोगो को बाँटने के लिये जाति का निर्माण किया, आज लोग जाति में बंटे हुए है, इनको तो यह भी नहीं पता की जाति में वो बाँटकर इन लोगो को तोड़ कर राज कर रहे है |

      और ये आपस में न जुड़ पाए, इस तरह सडयन्त्र किया, मेरा जाति बड़ा, इसी तरह से आपस में लड़ते रहे, पर ये कभी एक होने की नहीं सोचेंगे |

      जाति में बाँटा सो बाँटा अब ये लोग गोत्र को पकड़ लिए है, पहले मनु ने बाँटा अब ये आपस में खुद सरनेम को गोत्र को बढ़ावा देकर जाति से भी बड़ी मानसिकता सरनेम को पकड़ लिए है |

      आज अगर सतनामी की बात करें तो, वास्तविक सरनेम 100 कुछ होंगे, पर आज के समय में सभी अपनी एक गोत्र को अनेक नाम दे रहे है, इस तरह से एक सतनामी 1000 गोत्र में बंट गया है |

     जब कोई भी किसी गाँव में जाता है, तो जानने की कोशिश करता है, यहाँ कितने सतनामी रहते है, फिर ओ अपनी गोत्र के लोगो को जानने की कोशिश करता है, यहाँ इस सरनेम के कितने लोग रहते है |

     उसके मन यह भावना होती है, की यह गोत्र वाले मेरे अपने है, तो क्या वह पूरा सतनामी तुम्हारा अपना नहीं |
सरनेम, उपनाम, गोत्र, क्या है ?

    प्रारम्भिक समय में जब कोई कुछ ऐसा कर्म करता था, की वाह-वाही का पात्र हो, तो लोग उसे उत्साह वर्धन करने के लिए, उसे कुछ सम्बोधन नाम देते थे, जैसे अगर किसी ने बाघ मार कर किसी का जान बचाया हो, या बाघ का शिकार किया हो उसे, कहेंगे बाघमारे |

सरनेम की आवश्यकता कब होती है ?

     गोत्र या सरनेम की शुरुआत एक परिवार से होती है, इस अनुसार से यह माना जाता है, एक गोत्र के सभी परिवार हुए,
    आज के समय में पुराने सरनेम का कोई महत्व नहीं रहा, बस इतना है, जब विवाह होने वाला हो, तो यह देखा जाता है, लड़का और लड़की का सरनेम एक गोत्र का तो नहीं, जब एक हो जाता है तो, सम्बन्ध में भाई बहन मान लिया जाता है |

 लेकिन यह धारणा को इस अनुसार से देखते है,
महिला और पुरुष का जब विवाह होता है, तो महिला का सरनेम बदलकर पुरुष का जो सरनेम होता है, वह हो जाता है,
उदाहरण
महिला का सरनेम ( धरती )
पुरुष का सरनेम ( आकाश )
विवाह के बाद दोनों का ( आकाश ) पुरुष प्रधान में,
बच्चों का सरनेम ( आकाश ) होगा |
अब दुसरे परिवार का एक दूसरा लड़का है जिसका सरनेम ( धरती ) है,
वह आकाश नाम के सरनेम वाली लड़की से विवाह करना चाहता है,
तो यहाँ विवाह तो हो रहा है | फिर सरनेम का क्या वजूद
आज सतनामी का 1000 सरनेम हो गया है,

       जब किसी से नाम पूछा जाता है, तो नाम के साथ वह सरनेम भी बताता है, और वह फिर कहता है, यह कौन से जाति में आता है, या धर्म, ये क्या है, मेरे समझ से तो परे है |
     आज लोग अपनी विरादरी को पहचान नहीं कर पा रहे |
लगातार टूट रहे है |

    आज जितने गोत्र को लोग जानते है, अगर भारत के राज्यों का, अपने जिलो का, विधानसभा एरिया का नाम जानने में लगाया होता तो, बहुत बड़ा प्राणी हो गया होता |

      अगर सतनामी पंत है, तो सरनेम को इस पंत में कही महत्त्व भी नहीं दिया गया है |
और अगर सतनामी का धर्म सतनाम है, तो सतनामी क्या है ?

     सतनाम धर्म के अनुसार मानव-मानव एक बराबर है, जाति भेद, ऊँच नीच का यहाँ कोई स्थान नहीं, कोई भी मानव सतनाम धर्म को स्वीकार कर सकता है, तो बताओ अगर कोई बौद्ध परिवार सतनाम धर्म स्वीकार करता है, तो वह अपना सरनेम क्या लिखेगा |

     जिस तरह से यशवंत जी सतनामी लिखते है, मिलेचरण के पुरखा पहले यादव थे, अब सतनामी लिखते है |
तो आप क्यों नहीं लिखते ?

      मै तो उन लोगो को ही असली सतनामी कहता हूँ, जो सरनेम में सतनामी लिखता है |
अगर सभी मानव एक बराबर है, तो सबका सरनेम भी एक होना चाहिए, इस अनुसार से सभी सतनाम धर्म के लोगो का सरनेम भी एक सतनामी होना चाहिए |

      बात फिर आ जाता है, विवाह का तो इसका उपाय यह हो सकता है, लड़के और लड़की का विवाह होने से पहले रिश्तेदारी में यह देखा जाए, कही दोनों में कोई भाई बहन का अन्य संबध तो नहीं |

    माता पिता ने बच्चों को सिर्फ नाम दिया होता है, ये सरनेम जबरदस्ती मिला होता है, इस अनुसार से नाम का महत्व होना चाहिए, सरनेम का नहीं |

     आज के समय में कोई किसी का नाम नहीं जानता, कहते फिरते है, और अंडे जी, मंडे जी, सन्डे जी को देखा, ये क्या है,
नाम के महत्व को निचा दिखाना, और मनुवाद को बढ़ावा देना |
मैंने तो अपना सरनेम नाम से हटा लिया है,
लिखने में भी सतनामी ही लिखूंगा |
समय आएगा तो भारतीय लिखूंगा |

पर मुझे मेरे नाम से गाँव के नाम से माता पिता के नाम से जानना |

कोई दुसरे समाज के लोग कहेंगे, अब योगेन्द्र तू जाति वादी हो गया |
मै कहूँगा, आप भी मेरी तरह कहें और करें,
मुझे अपने अनुसार से मन पसंद किसी धर्म, किसी जाति से विवाह करने का पूरा छुट समाज की तरफ से मिला है,
क्या आपको मिला है ?
मैंने तो सबको एक बराबर देखा है, मुझसे मेरा जाति न पूछना, मेरी कोई जाति नहीं, मेरा धर्म न पूछना, मानवता ही मेरा धर्म है,
मुझसे गोत्र न पूछना, मै गोत्र नहीं मानता |
तो सतनामी क्या है ? सत्य में चलने का मार्ग |
- सादर विचार योगेन्द्र कुमार फेसबुक से जुड़े Yogendra Kumar
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